छत्तीसगढ़ के सरगुजा संभाग में हाथी-मानव संघर्ष थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। इसी कड़ी में सूरजपुर जिले के छतरपुर गांव से एक ऐसा CCTV फुटेज सामने आया है, जिसने पूरे इलाके में दहशत बढ़ा दी है। फुटेज में एक अकेला जंगली हाथी एक व्यक्ति का पीछा करते हुए घर के दरवाजे तक पहुंच जाता है और सूंड अंदर डालकर हमला करने की कोशिश करता है। स्थानीय लोग इस हाथी को ‘कबरा’ कहते हैं और अब यह नाम इलाके में आतंक का पर्याय बन चुका है।
सूरजपुर जिले के छतरपुर गांव में सुबह करीब 4 बजे का यह फुटेज सामने आया है, जिसमें कन्नी लाल जायसवाल नाम के एक व्यक्ति को घर से बाहर निकलते दिखाया गया है। जैसे ही उनकी नजर सामने मौजूद हाथी पर पड़ती है, वे घबराकर वापस घर के भीतर भाग जाते हैं। कुछ ही सेकंड में हाथी तेजी से दौड़कर दरवाजे तक पहुंच जाता है और दरवाजे के भीतर अपनी सूंड डालकर अंदर मौजूद व्यक्ति पर हमला करने की कोशिश करता है। लगभग 29 सेकंड के इस फुटेज में हाथी की आक्रामकता साफ दिख रही है।
सरगुजा संभाग के सूरजपुर और बलरामपुर जिले के सीमावर्ती इलाकों में एक अकेला, दल से भटका हुआ हाथी ‘कबरा’ के नाम से जाना जाता है। उसके कान के पास सफेद और चितकबरा जैसा रंग होने की वजह से स्थानीय लोग इसे ‘कबरा’ कहते हैं। दल से अलग होने के कारण यह हाथी बेहद आक्रामक हो चुका है और इंसानों को देखते ही उनका पीछा कर हमला करता है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार इसी हाथी के हमलों में अब तक 9 से 12 लोगों की मौत हो चुकी है।
वन विभाग लगातार मुनादी कर रहा है और लोगों को सतर्क रहने, रात में बाहर न निकलने और खेत-खलिहान में अकेले न जाने की सलाह दे रहा है। विभाग ने ‘कबरा’ हाथी को बेहोश कर पकड़ने के लिए संबंधित अधिकारियों को पत्र लिखा है, ताकि इसे सुरक्षित स्थान पर शिफ्टेड किया जा सके। लेकिन अभी तक इस प्रस्ताव पर कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है, जिससे स्थानीय लोग दहशत में हैं और हर वक्त हमले का खतरा बना हुआ है। छत्तीसगढ़ में पिछले पांच साल में 335 से ज्यादा लोग हाथियों के हमलों में मारे जा चुके हैं, जो इस समस्या की गंभीरता को दर्शाता है।
सूरजपुर और आसपास के इलाकों में हाथियों के हमले की घटनाएं लगातार सामने आती रहती हैं, जिनमें किसान, मजदूर और रात में खलिहान में सो रहे लोग सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। कुछ मामलों में हाथियों के झुंड ने झोपड़ियों पर हमला कर बच्चों सहित कई लोगों की जान ले ली है। विशेषज्ञ और वन अधिकारी मानते हैं कि जंगल-सीमा का सिकुड़ना, फसल और गुड़ फैक्ट्रियों की महक, और हाथियों के पारंपरिक रास्तों में बस्तियों का आ जाना इस संघर्ष को बढ़ा रहा है।






