भारतीय चुनाव आयोग के भीतर आजकल काफी हलचल मची हुई है। बात यह है कि आयोग के दो चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार औपचारिक शिकायतें दर्ज कराई हैं। ये शिकायतें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के फैसलों के खिलाफ हैं। आम तौर पर चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक संस्था में सब कुछ आपसी सहमति से तय होता है, लेकिन इस बार मामला इतना गंभीर हो गया कि दो आयुक्तों को देश के सबसे बड़े नौकरशाह, यानी कैबिनेट सचिव तक शिकायत ले जानी पड़ी।
सबसे बड़ा मुद्दा है ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ यानी SIR प्रक्रिया। इस प्रक्रिया के तहत देश भर में 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट मतदाता सूची से हटा दिए गए। यह प्रक्रिया पहले सिर्फ बिहार के लिए शुरू की गई थी, लेकिन बाद में पूरे देश में लागू कर दी गई। दोनों आयुक्तों का कहना है कि इस प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी है और कई फैसले उनकी जानकारी या सहमति के बिना लिए गए।
जुलाई 2026 में फॉर्म 6, जो नए मतदाताओं के पंजीकरण का फॉर्म है, में एक नया सवाल जोड़ दिया गया। इस सवाल में नए मतदाताओं से पूछा गया कि क्या उनका नाम, या उनके माता-पिता या दादा-दादी का नाम पिछली SIR मतदाता सूची में दर्ज था। यह सवाल पहले कभी नहीं पूछा गया था। चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने 16 मई को ही इस प्रस्ताव पर आपत्ति दर्ज की थी। उनका कहना था कि फॉर्म 6 एक कानूनी फॉर्म है जो ‘पंजीकरण नियम, 1960’ में तय है और इसे बिना सरकार की मंजूरी के बदला नहीं जा सकता। सुखबीर सिंह संधू ने भी 19 मई को इससे सहमति जताई थी। लेकिन इन आपत्तियों के बावजूद, यह बदलाव लागू कर दिया गया। संधू ने 13 अगस्त को इस कदम को “अनधिकृत और अवैध” बताया और तत्काल वापसी की मांग की।
दोनों आयुक्तों ने सबसे गंभीर आपत्ति मतदाता सूची के डेटाबेस के “धीरे-धीरे केंद्रीकरण” पर जताई है। कानून के तहत मतदाता सूची की जिम्मेदारी स्थानीय निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO) की होती है, जो आमतौर पर जिले के उप-मंडल मजिस्ट्रेट होते हैं। लेकिन ECINet सॉफ्टवेयर के माध्यम से दिल्ली में DG(IT) के स्तर पर नियंत्रण केंद्रीकृत हो गया है। इससे स्थानीय ERO, CEO और DEO के पास “उचित और पूर्ण पहुंच” नहीं बची है। विवेक जोशी ने 29 मई को मुख्य चुनाव आयुक्त को लिखे पत्र में बाहरी विशेषज्ञ (IIT से) द्वारा ऑडिट का प्रस्ताव रखा था ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि “केवल संबंधित कानूनी अधिकारियों के पास ही डेटाबेस में बदलाव करने की पहुंच हो”। संधू ने लिखा कि यह “अजीब” है कि मतदाता सूची की जिम्मेदारी स्थानीय अधिकारियों की है, लेकिन “एक्सेस कंट्रोल DG(IT) स्तर पर केंद्रीकृत” है। DG(IT) के पास कानूनी तौर पर स्थानीय अधिकारियों की पहुंच को प्रतिबंधित करने का कोई अधिकार नहीं है।
इस केंद्रीकरण के खतरनाक नतीजे सामने आए हैं। गोवा में 97 लोगों ने ERO की आवश्यकताओं को पूरा किया, उनके दस्तावेज सही थे, ERO ने उन्हें पात्र पाया, लेकिन दिल्ली से नियंत्रित सॉफ्टवेयर ने ERO के फैसले को रिकॉर्ड करने की अनुमति नहीं दी। यानी एक मतदाता पात्र हो सकता है, सबूत दे सकता है, कानून द्वारा नियुक्त अधिकारी उसे पात्र पा सकता है, लेकिन फिर भी मतदाता सूची में नाम नहीं होगा क्योंकि रोल एक केंद्रीय रूप से नियंत्रित सिस्टम है जिसने ERO को बाहर कर दिया।
जब दिल्ली में प्रशासनिक प्रभाग के एक नए अधिकारी ने कार्य आवंटन आदेश जारी किया जिससे इन शक्तियों का और केंद्रीकरण होने का खतरा पैदा हुआ, तो दोनों आयुक्तों ने अलग-अलग देश के सर्वोच्च नौकरशाह, कैबिनेट सचिव टीवी सोमनाथन को पत्र लिखे। यह एक संवैधानिक संस्था के भीतर इतनी गंभीर असहमति का संकेत है कि दो आयुक्तों को बाहरी हस्तक्षेप के लिए कैबिनेट सचिव का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
चुनाव आयोग ने इन रिपोर्टों का खंडन किया है। आयोग का कहना है कि सभी निर्णय सर्वसम्मति से और दोनों चुनाव आयुक्तों और मुख्य चुनाव आयुक्त की मंजूरी से लिए गए हैं। आयोग ने कहा कि लिखित नोट, टिप्पणियां और तकनीकी सुझाव “मानक, चल रही प्रथाएं” हैं और कानूनी अनुपालन सुनिश्चित करने तथा मतदाता अधिकारों की रक्षा के लिए आंतरिक जांच और संतुलन का हिस्सा हैं। आयोग के स्रोतों ने कहा कि निर्णय प्रक्रिया के दौरान उठाए गए प्रश्न या सुझाव अंतिम निर्णय पर औपचारिक असहमति नहीं हैं। लेकिन इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, संधू और जोशी की आपत्तियां फाइल पर दर्ज थीं और कुछ कार्यों को “अनधिकृत” और “अवैध” बताया गया था।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद कुछ राज्यों में गैरकानूनी तरीके से वोटरों को हटाए जाने के मामले सामने आए हैं। मतदाताओं के पुनर्निर्धारण और अपील प्रक्रिया में अनुचित देरी हुई है। 2009 और 2019 में भी चुनाव आयोग में असहमति और पारदर्शिता को लेकर गंभीर संकट आए थे। मौजूदा घटनाक्रम इसकी एक और कड़ी है, जो संकेत देती है कि संस्थागत सुधार की जरूरत है।
चुनाव आयोग, जो लोकतंत्र की रीढ़ है, के कामकाज में चल रहे ये विवाद मतदाता अधिकारों की सुरक्षा, प्रक्रिया की पारदर्शिता और संवैधानिक जिम्मेदारी की रक्षा के लिए खतरा हैं। जब दो प्रमुख आयुक्त लगातार लिखित शिकायतें कर रहे हों और कैबिनेट सचिव तक पहुंच रहे हों, तो यह संस्था के कामकाज और लोकतंत्र के लिए गंभीर संकेत हैं। इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद विपक्षी पार्टियों ने चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर सवाल उठाए हैं। कुछ पार्टियों ने CEC की हटाए जाने की मांग भी की है।





