छत्तीसगढ़ में शराब की बिक्री से होने वाली सरकारी कमाई के आंकड़े बार-बार यह सवाल खड़ा करते हैं कि क्या राज्य सरकारें शराबबंदी के वादों को सिर्फ राजनीतिक मुद्दा मानती हैं, या इसे सच में जनहित की प्राथमिकता बनाने को तैयार हैं। जब शराब से राजस्व बढ़ता जाए और सरकारें उसे विकास का सहारा बताती रहें, तो शराबबंदी की बात अक्सर सिर्फ भाषणों तक सीमित रह जाती है।
राजस्व के आंकड़े
वित्तीय वर्ष 2026-27 के पहले सात महीनों, अप्रैल से अक्टूबर तक, छत्तीसगढ़ को शराब बिक्री से 6,494 करोड़ रुपए का राजस्व प्राप्त हुआ है। यह पिछले वर्ष की इसी अवधि के 6,042 करोड़ रुपए से 452 करोड़ रुपए अधिक है।
आबकारी विभाग ने चालू वित्तीय वर्ष के लिए कुल 13,000 करोड़ रुपए राजस्व का लक्ष्य रखा है, जो पिछले वर्ष के अनुमान से लगभग 10 प्रतिशत अधिक है। वित्तीय वर्ष 2025-26 में शराब से लगभग 10,751 करोड़ रुपए की आय हुई थी, जबकि 2019-20 में यह आंकड़ा करीब 4,952 करोड़ रुपए था।
आबकारी विभाग से प्राप्त राजस्व (करोड़ रुपये में)
| महीना | वित्तीय वर्ष 2025-26 | वित्तीय वर्ष 2026-27 |
|---|---|---|
| अप्रैल | ₹887 करोड़ | ₹804 करोड़ |
| मई | ₹1,001 करोड़ | ₹1,105 करोड़ |
| जून | ₹876 करोड़ | ₹927 करोड़ |
| जुलाई | ₹744 करोड़ | ₹970 करोड़ |
| अगस्त | ₹806 करोड़ | ₹860 करोड़ |
| सितंबर | ₹839 करोड़ | ₹933 करोड़ |
| अक्टूबर | ₹886 करोड़ | ₹892 करोड़ |
| कुल राजस्व | ₹6,042 करोड़ | ₹6,494 करोड़ |
राजस्व बनाम सामाजिक नुकसान
शराब की बिक्री से होने वाली कमाई सरकार के लिए आसान राजस्व का बड़ा स्रोत बन चुकी है, लेकिन इसका सामाजिक मूल्य भी उतना ही गंभीर है। परिवारों में हिंसा, घरेलू कर्ज, स्वास्थ्य समस्याएं, सड़क दुर्घटनाएं और महिलाओं व बच्चों पर पड़ने वाला प्रभाव ऐसे नुकसान हैं, जिन्हें राजस्व के आंकड़ों में नहीं दिखाया जाता।
राज्य में अब 703 शराब दुकानें संचालित हैं और नई दुकानों व बारों का विस्तार भी जारी है। ऐसे में सवाल यह है कि जब सरकार शराब की उपलब्धता और बिक्री बढ़ाने की दिशा में कदम उठा रही है, तो नशा मुक्त समाज की बात कितनी विश्वसनीय रहती है।
पिछली सरकारों का रिकॉर्ड
पिछली कांग्रेस सरकार ने शराबबंदी का संकल्प तो दिया, लेकिन व्यावहारिक रूप से उस दिशा में ठोस और समयबद्ध कदम नहीं उठाए गए। विपक्ष में रहते हुए भाजपा ने भी इस मुद्दे पर कांग्रेस सरकार को लगातार घेरा, लेकिन सत्ता में आने के बाद शराबबंदी की दिशा में कोई निर्णायक बदलाव सार्वजनिक रूप से नहीं दिखा।
यह दुखद है कि शराबबंदी को चुनावी मुद्दा बनाया जाता है, पर सत्ता में आने के बाद राजस्व की चिंता उसे पीछे धकेल देती है। नतीजा यह है कि राज्य की जनता, विशेषकर महिलाएं, शराब के दुष्परिणामों का बोझ बरदाश्त करती रहती हैं।
छत्तीसगढ़ के हित में सरकार को शराबबंदी को मात्र घोषणा नहीं, बल्कि चरणबद्ध और जवाबदेह नीति बनानी चाहिए। इसके लिए पहले राज्य में शराब की खपत, निर्भरता, अपराध, स्वास्थ्य-प्रभाव और राजस्व पर निर्भरता का पारदर्शी आकलन होना चाहिए।
सरकार को यह भी बताना होगा कि शराबबंदी से होने वाले संभावित राजस्व नुकसान की पूर्ति किन वैकल्पिक स्रोतों से होगी। बिना यह रोडमैप बताए शराबबंदी की बात करना आसान है, पर उसे लागू करना मुश्किल; और बिना इरादे के उसे टालना और भी आसान।
छत्तीसगढ़ की जनता यह जानने की हकदार है कि सत्ताधारी और विपक्षी दलें शराबबंदी को केवल चुनावी राजनीति का हथियार मानती हैं, या वास्तव में राज्य को नशा मुक्त बनाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। जब तक सरकार राजस्व के मोह को छोड़कर जनस्वास्थ्य, परिवार की सुरक्षा और सामाजिक कल्याण को प्राथमिकता नहीं देगी, शराबबंदी का संकल्प कागजी बयान बना रहेगा।
शराब से मिलने वाला राजस्व राज्य की आय बढ़ा सकता है, लेकिन वह राज्य की सामाजिक-पारिवारिक सेहत को नहीं बचा सकता। छत्तीसगढ़ को अब ऐसी सरकार चाहिए, जो शराबबंदी को वादा नहीं, बल्कि जनता के प्रति जिम्मेदारी माने।




