बस्तर की नदियों का लाल होना सिर्फ़ मानसून और लाल मिट्टी की कहानी नहीं है। इंद्रावती, बैलाडीला की शंखिनी और डंकिनी जैसी नदियों में बहता लाल रंग बस्तर के उस दोहरे दर्द का प्रतीक है, जिसे यहां का इंसान वर्षों से झेल रहा है।
एक तरफ खनन उद्योग से तबाह होती नदियां, लौह अयस्क (Iron Ore) के अंधाधुंध खनन और वॉशिंग प्लांट से निकलने वाली लाल गाद (Tailings) ने सालों से क्षेत्र के जल स्रोतों को ज़हरीला बना दिया है। शंखिनी नदी को बस्तर की सबसे प्रदूषित नदी मानी जाती है, जिसका पानी खनन के कचरे से लाल हो चुका है।
खनन और संघर्ष के बीच पिसता बस्तर
पारिस्थितिकी का विनाश:बैलाडीला की पहाड़ियों से होने वाले खनन के कारण आसपास के दर्जनों गांवों का पीने का पानी प्रदूषित हो चुका है। खेती योग्य ज़मीन पर लाल गाद जमने से फसलें चौपट हो रही हैं।
संसाधनों की लूट बनाम स्थानीय अधिकार:जल, जंगल और जमीन की इसी जंग को हथियार बनाकर दशकों से हिंसा का चक्र चलाया गया। एक तरफ़ कॉरपोरेट और सरकार विकास के दावे करते रहे, तो दूसरी तरफ यही जंगलो का विनाशक बनता जा रहा है।
विकास की कीमत कौन चुका रहा?:खनन से अरबों रुपये का राजस्व और लोहा तो निकाला जा रहा है, लेकिन नदियों किनारे बसे आदिवासियों के हिस्से सिर्फ़ प्रदूषित लाल पानी, बीमारियां ही पनप रही है।
सवाल सिर्फ़ बारिश में बहती लाल मिट्टी का नहीं है, बल्कि उस खनन उद्योग का है जिसने बस्तर की नसों में बहने वाले पानी को ही मटमैला और ज़हरीला बना दिया। बस्तर के लोग आज भी यही पूछ रहे हैं कि उनके जल-जंगल-जमीन को इस लाल रंग प्रदूषण से आज़ादी कब मिलेगी?
छत्तीसगढ़ में लगातार औद्योगीकरण और खनन का विस्तार हो रहा है। खनिज संपदा के दोहन के साथ कई इलाकों में जंगलों और पेड़ों की कटाई भी चिंता का विषय बनती जा रही है। पहाड़ों और जंगलों पर बढ़ता खनन का दबाव सिर्फ़ पर्यावरण को प्रभावित नहीं करता, बल्कि इसका सीधा असर नदियों, भूजल, खेती और स्थानीय लोगों के जीवन पर भी पड़ता है।
सवाल यही है कि विकास की इस दौड़ में जल, जंगल और जमीन की कीमत कौन चुका रहा है? अगर आज नदियों का पानी लाल हो रहा है और जंगल लगातार घट रहे हैं, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वच्छ पानी, घने जंगल और सुरक्षित पर्यावरण कौन बचाएगा?





