छत्तीसगढ़ की जेलों में जो हो रहा है, वह सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि कानून और संविधान की खुली अनदेखी है। 500 से ज्यादा सजायाफ्ता कैदी अपनी पूरी सजा काट चुके हैं, फिर भी आज तक रिहाई नहीं। सवाल सीधे सरकार और गृह विभाग संभाल रहे उपमुख्यमंत्रीविजय शर्मा पर खड़ा होता है।
राज्य की जेलों की क्षमता लगभग 14 हजार है, लेकिन 22 हजार से ज्यादा कैदी बंद हैं। जेलें पहले से ही ठसाठस भरी हुई हैं। ऊपर से जिनकी सजा पूरी हो चुकी है, उन्हें भी नहीं छोड़ा जा रहा। आखिर यह किसकी नाकामी है?
120 दिन का नियम, 365 दिन की चुप्पी
नियम साफ कहता है—सजा पूरी होने के 120 दिन के भीतर रिहाई की प्रक्रिया पूरी करनी होगी। लेकिन छत्तीसगढ़ में 6 महीने, 1 साल और कहीं-कहीं डेढ़ साल तक फाइलें अटकी पड़ी हैं। कलेक्टर, एसपी, रिव्यू बोर्ड और गृह विभाग के बीच फाइलें घूम रही हैं, लेकिन कैदी सलाखों के पीछे सड़ रहे हैं।
अगर प्रक्रिया इतनी लंबी है तो जिम्मेदारी तय क्यों नहीं हो रही?
अगर अभिमत लेने में देरी है तो जवाबदेही किसकी है?
और अगर सब ठीक चल रहा है तो 500 से ज्यादा लोग आज भी जेल में क्यों हैं?
सीआरपीसी 432(2) या बहाना?
सरकार कहती है कि अब धारा 432(2) के तहत विस्तृत प्रक्रिया अपनाई जा रही है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि इस प्रक्रिया ने रिहाई को और धीमा कर दिया है। सवाल उठता है—क्या यह कानून का पालन है या कानून के नाम पर कैद को लंबा करना?
संवैधानिक अधिकारों पर चोट?
जब कोई व्यक्ति अपनी सजा पूरी कर चुका है, तो उसे जेल में रखना उसके मौलिक अधिकारों पर सीधा प्रहार है। यह सिर्फ एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनहीनता भी है।
क्या छत्तीसगढ़ में सजा पूरी होने के बाद भी जेल में रहना नई सजा बन चुकी है?
और अगर नहीं, तो इन 500 से ज्यादा कैदियों को आज तक आज़ादी क्यों नहीं मिली?



