छत्तीसगढ़ में ऐसे भवन खड़े कर दिए गए, जिनका कभी उपयोग ही नहीं हुआ और जो देखते-देखते खंडहर बन गए। जनता की खून-पसीने की कमाई इस तरह बर्बाद करना बेहद शर्मनाक है। बिना योजना के निर्माण के पीछे एक कारण तो कमीशनखोरी भी माना जाता है। हर बार सरकारी पैसा लुटे और जिम्मेदार बच जाएं, यह कब तक चलेगा?
ऐसा ही एक मामला हसौद के शासकीय नवीन कॉलेज से सामने आया है, जहां करीब 2 करोड़ 72 लाख रुपए की लागत से बनाया गया 100 सीटर बालक छात्रावास निर्माण पूरा होने के करीब पांच साल बाद भी विद्यार्थियों के काम नहीं आ सका। वर्ष 2017-18 में स्वीकृत इस छात्रावास का निर्माण वर्ष 2021-22 में पूरा बताया गया, लेकिन भवन आज तक कॉलेज प्रबंधन को हैंडओवर नहीं किया गया।
गुणवत्ता और अधूरे काम के चलते नहीं लिया हैंडओवर
छात्रावास निर्माण की जिम्मेदारी लोक निर्माण विभाग (PWD) को दी गई थी। निर्माण पूरा होने के बाद भवन को कॉलेज प्रबंधन को सौंपने की प्रक्रिया शुरू हुई, लेकिन निरीक्षण के दौरान कई कमियां सामने आईं। दरवाजे, लाइट, फर्श, पानी की व्यवस्था, सफाई और अन्य कार्यों को लेकर कॉलेज प्रबंधन ने आपत्ति जताई।
गुणवत्ता संबंधी शिकायतों और अधूरे कार्यों के चलते कॉलेज प्रबंधन ने भवन का हैंडओवर लेने से इनकार कर दिया। नतीजा यह रहा कि करोड़ों रुपए खर्च होने के बावजूद छात्रावास में एक भी विद्यार्थी को रहने की सुविधा नहीं मिल सकी।
उपयोग से पहले ही टूटने लगे दरवाजे-खिड़कियां
लंबे समय से खाली पड़े भवन की हालत अब लगातार खराब होती जा रही है। बारिश और रखरखाव के अभाव में दीवारों में जगह-जगह दरारें दिखाई देने लगी हैं और कई हिस्सों का प्लास्टर उखड़ रहा है।
भवन की खिड़कियां और दरवाजे टूट चुके हैं। अंदर लगी टाइल्स भी उखड़ने लगी हैं या गायब हो चुकी हैं। बताया जा रहा है कि लंबे समय तक भवन खाली रहने का फायदा असामाजिक तत्वों ने उठाया और वहां लगे पंखे, लाइटें, नल, लोहे की ग्रिल, खिड़कियों के हिस्से और अन्य सामान चोरी हो गए।
जिस भवन को विद्यार्थियों की सुविधा के लिए बनाया गया था, वह अब उपयोग शुरू होने से पहले ही बदहाली की तस्वीर बन गया है।
हॉस्टल नहीं मिला तो किराए के कमरे में रहने को मजबूर छात्र
हसौद क्षेत्र के आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में विद्यार्थी शासकीय कॉलेज में पढ़ने आते हैं। छात्रावास शुरू नहीं होने के कारण दूरदराज के विद्यार्थियों को या तो रोजाना लंबी दूरी तय करनी पड़ती है या फिर किराए का कमरा लेकर रहना पड़ता है।
ग्रामीण योगेंद्र साहू के मुताबिक, बाहर से आने वाले विद्यार्थियों को काफी परेशानी होती है। किराए के कमरे में रहने वाले छात्रों को हर महीने करीब 2 से 3 हजार रुपए या उससे अधिक खर्च करना पड़ता है। यदि 100 सीटर छात्रावास समय पर शुरू हो जाता तो बड़ी संख्या में विद्यार्थियों को आर्थिक और आवागमन की परेशानी से राहत मिल सकती थी।
सवाल सिर्फ एक भवन का नहीं, जवाबदेही का है
हसौद का यह छात्रावास सरकारी निर्माण की उस व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है, जिसमें करोड़ों रुपए खर्च करके भवन तो खड़े कर दिए जाते हैं, लेकिन उनके उपयोग, गुणवत्ता, हैंडओवर और रखरखाव की जिम्मेदारी तय नहीं हो पाती।
₹2.72 करोड़ खर्च होने के बाद भी अगर विद्यार्थियों को सुविधा नहीं मिली और भवन उपयोग से पहले ही टूटने लगा, तो आखिर इस निर्माण की जिम्मेदारी किसकी है?
सरकारी धन जनता की कमाई है। ऐसे मामलों में केवल भवन का निर्माण पूरा होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि वह समय पर उपयोग में आए और जनता को उसका वास्तविक लाभ मिले। जरूरत इस बात की है कि मामले की जांच हो, निर्माण में हुई कमियों और देरी की जिम्मेदारी तय की जाए और दोषियों पर कार्रवाई के साथ छात्रावास को जल्द विद्यार्थियों के उपयोग में लाया जाए।





