हाईकोर्ट के बार-बार के निर्देश और राज्य सरकार के दावों के बाद भी छत्तीसगढ़ में गायों की हालत खराब है। गाय को राष्ट्र माता घोषित करने की मांग करने वाले भी इस ओर ध्यान नहीं दे रहे हैं। राजधानी से लेकर जिलों तक सड़कों पर मवेशियों की मौजूदगी न सिर्फ उनके लिए खतरा बनी हुई है, बल्कि आए दिन सड़क हादसों में इंसानों और पशुओं की जान जा रही है।
रायपुर के फुंडहर गोठान में लगातार गायों की मौत के बीच नगर निगम की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। गोठान की क्षमता महज 260 गायों की है, जबकि यहां 600 से अधिक मवेशी रखे गए हैं। रविवार को 8 गायों की मौत के बाद सोमवार को निगम ने करीब 60 गायों को दूसरी जगह शिफ्ट करने की कोशिश की। छह काऊ कैचर वाहनों में निकली टीम करीब 7 घंटे तक 46 किलोमीटर का चक्कर काटती रही, लेकिन धनेली, जरवाय और अटारी की तीनों गोठानों ने क्षमता और संसाधनों की कमी का हवाला देकर मवेशियों को रखने से इनकार कर दिया। आखिरकार सभी गायों को वापस फुंडहर गोठान में ही छोड़ना पड़ा।
यह स्थिति बताती है कि मवेशियों की शिफ्टिंग के लिए नगर निगम के पास न पर्याप्त जगह है और न कोई ठोस योजना। नतीजा यह है कि एक ओर गोठानों में क्षमता से अधिक मवेशी हैं, तो दूसरी ओर शहर और हाईवे की सड़कों पर आवारा पशुओं का जमावड़ा बना हुआ है।
धमतरी में भी हालात चिंताजनक हैं। जिला प्रशासन, नगर निगम और पुलिस प्रशासन की बैठकों और दावों के बावजूद शहर की प्रमुख सड़कों पर मवेशियों की मौजूदगी कम नहीं हुई है। धमतरी-नगरी रोड, रत्नाबांधा-गुंडरदेही मार्ग और रायपुर-जगदलपुर नेशनल हाईवे समेत कई व्यस्त मार्गों पर मवेशी सड़कों के बीच बैठे नजर आते हैं। पुलिस प्रशासन की पूर्व समीक्षा में सामने आया था कि सड़क हादसों के करीब 12 प्रतिशत मामलों में मवेशी कारण बन रहे हैं।
नगर निगम का दावा है कि मवेशियों की धरपकड़ लगातार जारी है, लेकिन जमीनी तस्वीर इन दावों पर सवाल खड़े करती है। करीब 15 साल बीतने के बाद भी गोकुल नगर नहीं बस पाया है। शहर की करीब 110 डेयरियों में से अधिकांश के पशु मालिक सुबह दूध निकालने के बाद मवेशियों को खुला छोड़ देते हैं। ऐसे पशु मालिकों पर प्रभावी कार्रवाई नहीं होने से समस्या लगातार बनी हुई है।

हाईकोर्ट के आदेशों पर भी अमल नहीं
सड़कों पर बेसहारा मवेशियों को लेकर हाईकोर्ट पहले ही सख्त निर्देश दे चुका है। पशु मालिकों के पानी के कनेक्शन काटने और निगम की सुविधाओं से वंचित करने जैसे फैसलों की बात भी सामने आई, लेकिन इनमें से कई कदम जमीन पर प्रभावी तरीके से लागू नहीं हो सके।
विडंबना यह है कि रुद्री चौक से अंबेडकर चौक तक जैसे प्रमुख मार्गों पर भी मवेशी सड़कों के बीच बैठे दिखाई देते हैं। इन रास्तों से जिले के बड़े अधिकारी नियमित रूप से गुजरते हैं, इसके बावजूद समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो पा रहा है।
आदेश और समीक्षा बैठकों का असर कहां?
19 अगस्त को जनसंपर्क विभाग की ओर से जारी जानकारी में बताया गया था कि कलेक्टर अबिनाश मिश्रा ने मवेशियों को पकड़ने के लिए विशेष अभियान चलाने के सख्त निर्देश दिए हैं। लेकिन इसके कई दिन बाद भी सड़कों पर मवेशियों की मौजूदगी सवाल खड़े कर रही है। ऐसे में सवाल है कि जब प्रशासनिक स्तर पर आदेश जारी हो रहे हैं और लगातार समीक्षा बैठकें हो रही हैं, तो उनका असर जमीन पर क्यों नहीं दिख रहा?
हाईवे पर 13 मवेशियों को ट्रक ने रौंदा
इस लापरवाही का सबसे दर्दनाक उदाहरण शहर के आउटर इलाके में राज इंपीरियल के सामने देखने को मिला। फोरलेन पर रविवार देर रात करीब 2 बजे सड़क पर बैठे 13 मवेशियों को अज्ञात ट्रक ने कुचल दिया। हादसे में 11 मवेशियों की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि दो घायल बताए गए। हादसे के बाद स्थानीय लोगों ने करीब आधे घंटे तक जाम कर विरोध जताया।
हाईवे के डिवाइडर की लाइटें बंद थीं और सर्विस रोड का निर्माण चलने के बावजूद पर्याप्त संकेतक और सुरक्षा व्यवस्था नजर नहीं आई। अंधेरे में सड़क पर बैठे मवेशी दिखाई नहीं देने से हादसे का खतरा और बढ़ गया। ट्रक चालक हादसे के बाद फरार हो गया, जिसकी तलाश सीसीटीवी फुटेज के आधार पर की जा रही है।
तुमड़ीबोड़ में लोगों ने दिखाई जिम्मेदारी
जहां सरकारी व्यवस्था सवालों के घेरे में है, वहीं तुमड़ीबोड़ में स्थानीय स्तर पर एक सकारात्मक पहल सामने आई है। तुमड़ीबोड़ व्यापारी संघ और टाइगर क्लब के अध्यक्ष अजय जैन ने लगातार हो रहे हादसों को देखते हुए 22 अगस्त से तुमड़ीबोड़ से 10-15 किलोमीटर के दायरे में नेशनल हाईवे पर बैठे मवेशियों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने की व्यवस्था शुरू की है। इसके लिए 10 मजदूर लगाए गए हैं।
एक तरफ स्थानीय लोग मवेशियों और राहगीरों की जान बचाने के लिए आगे आ रहे हैं, दूसरी तरफ सरकारी तंत्र की योजनाएं, समीक्षा बैठकें और आदेश अब भी जमीन पर असरदार साबित होते नहीं दिख रहे।
सवाल सिर्फ गायों की सुरक्षा का नहीं है। सवाल यह भी है कि जब हाईकोर्ट निर्देश दे चुका है, सरकार लगातार व्यवस्था सुधारने के दावे कर रही है और अधिकारी विशेष अभियान के आदेश जारी कर रहे हैं, तो फिर सड़कों पर मवेशी और गोठानों में बदहाली क्यों बनी हुई है? गाय को लेकर बड़े-बड़े दावे और भावनात्मक नारे लगाने से आगे बढ़कर अब ठोस व्यवस्था और जिम्मेदारी तय करने की जरूरत है।






