दंतेवाड़ा।दंतेवाड़ा में जिम्मेदार अधिकारियों की लापरवाही अब शिक्षा व्यवस्था पर भारी पड़ती दिखाई दे रही है। जिला खनिज न्यास (DMF) से हर साल लगभग 350 करोड़ रुपये का फंड मिलने के बावजूद जिले के कई सरकारी स्कूल बदहाली का शिकार हैं। हालात ऐसे हैं कि आदिवासी बच्चों को आज भी बिना भवन, बिना बिजली, बिना बेंच और बुनियादी सुविधाओं के पढ़ने को मजबूर होना पड़ रहा है। यह स्थिति केवल प्रशासनिक अनदेखी नहीं, बल्कि बच्चों के भविष्य के साथ खुला खिलवाड़ है, जिसने अधिकारियों की कार्यशैली और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
जिले में पिछले पांच वर्षों से शिक्षा के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाने के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों की पोल खोल रही है। प्रशासनिक उदासीनता के कारण 11 स्कूल आज भी भवनविहीन हैं, जबकि 20 से अधिक स्कूल केवल एक कमरे में संचालित हो रहे हैं। बुरगुम बोजापारा, डोरापारा, नयानार जोगापाय और सुरनार डडापारा जैसे दूरस्थ इलाकों में पहली से पांचवीं तक के बच्चे एक ही कमरे में बैठकर पढ़ाई करने को मजबूर हैं।
सबसे चिंताजनक स्थिति सुरनार के डडापारा प्राथमिक शाला की है, जहां पहली से पांचवीं तक के 17 बच्चे एक छोटे से अंधेरे कमरे में टाटपट्टी पर बैठकर पढ़ाई करते हैं। इसी कमरे में शिक्षकों की कुर्सियां और स्कूल का पूरा सामान रखा हुआ है। स्कूल में न बिजली है, न बैठने के लिए बेंच और न ही बच्चों के लिए पर्याप्त जगह। मध्याह्न भोजन भी खुले आसमान के नीचे तैयार किया जाता है, जिससे बच्चों की सुरक्षा और स्वास्थ्य दोनों खतरे में हैं।
बदहाल व्यवस्था से नाराज ग्रामीण अब अपने बच्चों का नाम सरकारी स्कूलों से कटवाकर दूसरे स्कूलों में दाखिला करा रहे हैं। स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार अब तक चार बच्चों का प्रवेश अन्य स्कूलों में कराया जा चुका है। यह स्थिति बताती है कि शिक्षा व्यवस्था पर लोगों का भरोसा लगातार कमजोर होता जा रहा है।
डडापारा में तीन साल पहले स्कूल भवन की मरम्मत के नाम पर बच्चों को अस्थायी कमरे में शिफ्ट किया गया था, लेकिन निर्माण एजेंसी बजट की कमी का हवाला देकर अधूरा काम छोड़कर चली गई। तीन साल बाद भी न मरम्मत पूरी हुई और न ही नए भवन का निर्माण शुरू हो सका। पुराना भवन अब खंडहर में तब्दील हो चुका है।
इसी तरह बारसूर नगर पंचायत से करीब चार किलोमीटर दूर हितामेटा के झिटकीपारा में बाढ़ से स्कूल भवन क्षतिग्रस्त होने के बाद विभाग ने समय पर कोई व्यवस्था नहीं की। आखिरकार ग्रामीणों ने खुद झोपड़ी बनाकर स्कूल शुरू कराया, जहां करीब 20 बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब जिले को हर साल सैकड़ों करोड़ रुपये का फंड मिल रहा है, तब भी बच्चों को बुनियादी सुविधाएं क्यों नहीं मिल पा रही हैं। गर्मी की छुट्टियों के दौरान जर्जर स्कूल भवनों के जीर्णोद्धार का सुनहरा अवसर भी विभाग ने गंवा दिया। अब बारिश शुरू होने के बाद केवल प्रस्ताव और अनुशंसा की बातें हो रही हैं, जबकि बजट स्वीकृति अब भी फाइलों में अटकी हुई है।
दंतेवाड़ा की यह तस्वीर स्पष्ट संकेत देती है कि समस्या संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि अधिकारियों की जवाबदेही और कार्यशैली की है। जब पर्याप्त बजट होने के बावजूद स्कूल भवन नहीं बन पा रहे, बच्चों को सुरक्षित वातावरण नहीं मिल रहा और ग्रामीणों को खुद झोपड़ी बनाकर स्कूल चलाना पड़ रहा है, तो यह प्रशासनिक विफलता का गंभीर उदाहरण है। अब जरूरत केवल घोषणाओं की नहीं, बल्कि जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने और शिक्षा व्यवस्था में तत्काल सुधारात्मक कार्रवाई की है।





