छत्तीसगढ़ कांग्रेस में प्रदेश अध्यक्ष (PCC Chief) की कुर्सी को लेकर सियासी हलचल अपने चरम पर है। मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज का कार्यकाल 9 जुलाई को खत्म हो रहा है। ऐसे में कांग्रेस आलाकमान मिशन 2028 की तैयारी के तहत ऐसा चेहरा तलाश रहा है जो सिर्फ संगठन को संभाले ही नहीं, बल्कि भारतीय जनता पार्टी के मजबूत संगठन के सामने मजबूती से खड़ा भी हो सके।
पहला नाम – टीएस सिंहदेव, ‘बूढ़े शेर’ की वापसी?
सरगुजा से लेकर बस्तर तक अगर किसी नेता की स्वीकार्यता सबसे ज्यादा मानी जाती है तो वह हैं टीएस सिंहदेव। उनकी सादगी, संत जैसी छवि और संगठन चलाने का शांत लेकिन प्रभावी अंदाज हमेशा उन्हें बाकी नेताओं से अलग पहचान देता है।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि टीएस बाबा उन गिने-चुने नेताओं में हैं जिनकी छवि पर आज तक कोई गंभीर दाग नहीं लगा। अगर कांग्रेस को भाजपा के मजबूत संगठन को सीधी चुनौती देनी है, तो कई नेताओं का मानना है कि “बूढ़े शेर” को फिर मैदान में उतारना पड़ सकता है।
दूसरा नाम – उमेश पटेल, ‘नहले पर दहला’ वाला विकल्प
दूसरे सबसे मजबूत दावेदार माने जा रहे हैं खरसिया विधायक और पूर्व मंत्री उमेश पटेल।
युवा चेहरा, प्रशासनिक अनुभव और संगठन पर अच्छी पकड़… यही उनकी सबसे बड़ी ताकत मानी जा रही है। उन्हें सरकार और संगठन दोनों चलाने का अनुभव है। साथ ही वे पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के सबसे भरोसेमंद नेताओं में गिने जाते हैं। कांग्रेस के भीतर यह भी माना जाता है कि उनकी बात हाईकमान तक मजबूती से पहुंचती है।
तीसरा नाम – देवेंद्र यादव, जिसने पुराने समीकरण हिला दिए
लेकिन इस पूरे सियासी खेल में एक ऐसा नाम भी है जिसे नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा—भिलाई विधायक देवेंद्र यादव।
युवा कांग्रेस की राजनीति से निकले देवेंद्र यादव ने बेहद कम समय में अपनी अलग पहचान बनाई है। प्रदेश का युवा वर्ग उन्हें अपना आइकॉन मानता है। आक्रामक राजनीति, जमीनी पकड़ और संघर्षशील छवि ने उन्हें कांग्रेस के सबसे चर्चित युवा नेताओं में ला खड़ा किया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उन्होंने कई पुराने नेताओं के पारंपरिक जनाधार को चुनौती दी है। विधानसभा से लेकर सड़क तक उनकी मुखर शैली विपक्ष को लगातार घेरती रही है। जातीय समीकरणों की बात करें तो यादव समाज का बड़ा वोट बैंक भी उनके पक्ष में एक अहम फैक्टर माना जा सकता है।
दीपक बैज भी रेस से बाहर नहीं
हालांकि मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आदिवासी चेहरे के तौर पर उनकी मजबूत पहचान है और बस्तर क्षेत्र में उनका प्रभाव कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। यदि कांग्रेस संगठन में निरंतरता बनाए रखना चाहे, तो बैज की दोबारा ताजपोशी की संभावना भी पूरी तरह खत्म नहीं मानी जा रही।
आखिर फैसला किसके पक्ष में जाएगा?
कांग्रेस के सामने चुनौती सिर्फ नया प्रदेश अध्यक्ष चुनने की नहीं, बल्कि 2028 के विधानसभा चुनाव की मजबूत नींव रखने की है। इसलिए हाईकमान ऐसा चेहरा चुनना चाहेगा जो संगठन को एकजुट रख सके, कार्यकर्ताओं में ऊर्जा भर सके और भाजपा के खिलाफ प्रभावी राजनीतिक लड़ाई लड़ सके।
अब देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस अनुभव पर भरोसा जताती है, युवा जोश पर दांव खेलती है या फिर संगठन में निरंतरता बनाए रखने का फैसला करती है। PCC की कुर्सी पर आखिर किसके सिर ताज सजेगा, इस पर पूरे प्रदेश की नजरें टिकी हैं।





