रायपुर।छत्तीसगढ़ में अल-नीनो के असर को देखते हुए राज्य सरकार पूरी तरह सतर्क हो गई है। कमजोर मानसून की आशंका के बीच किसानों को नुकसान से बचाने के लिए कई कदम उठाए जा रहे हैं। सरकार ने कम समय में तैयार होने वाली फसलों, दलहन-तिलहन को बढ़ावा देने, बीज सुरक्षित रखने और फसल बीमा पर खास जोर दिया है। इसकी जानकारी कृषि मंत्री राम विचार नेताम ने केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के दौरान दी।
बैठक में बताया गया कि 22 जून तक प्रदेश में औसतन 30.8 मिमी बारिश दर्ज हुई है, जो पिछले 10 साल के औसत से करीब 58.3 मिमी कम है। खरीफ सीजन में 48.69 लाख हेक्टेयर में खेती का लक्ष्य रखा गया है, लेकिन अब तक सिर्फ 2 प्रतिशत क्षेत्र में ही बोनी हो पाई है।
ऐसे हालात में किसानों को संभावित नुकसान से बचाने के लिए प्रशासन ने तैयारी तेज कर दी है।
कम अवधि वाली धान पर जोर, दलहन-तिलहन को बढ़ावा
कृषि विभाग ने बताया कि कम समय में तैयार होने वाली धान की किस्मों को बढ़ावा दिया जा रहा है। साथ ही मक्का, कोदो, कुटकी, रागी और दलहन-तिलहन फसलों के अच्छे बीज सुरक्षित रखे जा रहे हैं।
ऊंची जमीन वाले इलाकों में किसानों को मिश्रित खेती यानी अनाज के साथ दलहन-तिलहन लगाने की सलाह दी जा रही है। धान की जगह वैकल्पिक फसलों को अपनाने के लिए भी किसानों को प्रेरित किया जा रहा है।
फसल नुकसान की भरपाई के लिए बीमा कंपनियों के साथ मिलकर योजना को मजबूत किया जा रहा है। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर की ओर से भी अल-नीनो को ध्यान में रखकर आपातकालीन खेती योजना तैयार की गई है।
बीज वितरण पर भी काम तेज
अधिकारियों ने बताया कि सूखा प्रभावित 15 जिलों के लिए 1,22,095 क्विंटल बीज उपलब्ध कराया गया है। राज्य बीज निगम ने कुल 4.95 लाख क्विंटल प्रमाणित बीज वितरण का लक्ष्य रखा है। इनमें से अब तक 48,449 क्विंटल बीज किसानों तक पहुंच चुका है।
अल-नीनो का खेती पर असर
अल-नीनो एक मौसमी घटना है, जो प्रशांत महासागर के गर्म होने से बनती है। इसका असर सीधे मानसून पर पड़ता है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में बारिश कम या देर से होती है, जिससे खरीफ की मुख्य फसल धान पर असर पड़ता है।
मिट्टी में नमी कम होने से बीज अंकुरण प्रभावित होता है और खेती का पूरा चक्र बिगड़ सकता है। इसका असर सिर्फ पैदावार पर ही नहीं, बल्कि आगे पानी की कमी और पशु चारे की समस्या पर भी पड़ता है।





