नई दिल्ली: हाल के दिनों में सोशल मीडिया, विशेषकर Gen-Z (युवा पीढ़ी) के बीच एक अनूठा नाम तेजी से चर्चा का विषय बना हुआ है ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP)। इसके संस्थापक अभिजीत दिपके के दिल्ली पहुंचने और जंतर-मंतर पर ‘किताब और तिरंगा’ लेकर विरोध प्रदर्शन करने के आह्वान के बाद राजधानी में सुरक्षा व्यवस्था भी कड़ी कर दी गई है। हालांकि, सोशल मीडिया पर रील्स और ट्रेंड्स के जरिए खड़ी की जा रही इस ‘क्रांति’ को लेकर राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह भारत की वास्तविक और जमीनी राजनीति का स्थायी विकल्प नहीं बन सकती।
इस नए आंदोलन का “मुखौटा भले ही नया हो, लेकिन इसके पीछे का प्रोडक्ट वही पुरानी राजनीति है।”
सोशल मीडिया की ‘रील्स’ बनाम लोकतंत्र की ‘रियलिटी’
आज की युवा पीढ़ी (Gen-Z) सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर विरोध प्रदर्शनों और राजनीतिक आंदोलनों को एक ट्रेंड की तरह देखती है। डिजिटल स्पेस में किसी अभियान को वायरल करना या ट्रेंड कराना आसान है, लेकिन भारतीय लोकतंत्र की जमीनी वास्तविकता इससे पूरी तरह अलग है। लोकतंत्र में केवल सोशल मीडिया हाइप के दम पर राजनीतिक विकल्प खड़ा करना नामुमकिन है, क्योंकि भारत की चुनावी राजनीति के लिए बूथ स्तर पर संगठन, कार्यकर्ताओं की फौज और नीतिगत एजेंडे की आवश्यकता होती है, जो ऐसे वर्चुअल आंदोलनों में दिखाई नहीं देती।
नया मुखौटा, वही पुराना ढर्रा
‘कॉकरोच जनता पार्टी’ जैसी पहल देखने में भले ही आकर्षक और लीक से हटकर लगे, लेकिन इसके पीछे काम करने वाले एजेंडे और चेहरे वही पुराने राजनीतिक ढर्रे से जुड़े हुए हैं। जंतर-मंतर पर होने वाले प्रदर्शनों में किताबों और तिरंगे का इस्तेमाल कर एक बौद्धिक और राष्ट्रवादी छवि पेश करने की कोशिश की जा रही है, परंतु गहराई से देखने पर यह पारंपरिक राजनीतिक विरोध प्रदर्शनों का ही एक नया रूप (रीपैकेजिंग) नजर आता है।
क्यों नहीं बन सकते ये राजनीतिक विकल्प?
भारत का मतदाता बेहद परिपक्व है। भारतीय राजनीति में वही दल या आंदोलन टिक पाते हैं जिनकी जड़ें जनता की बुनियादी समस्याओं, जैसे- रोजगार, विकास, सुरक्षा और सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़ी होती हैं। सोशल मीडिया आधारित यह ‘टेंपरेरी हाइप’ (क्षणिक उत्साह) कुछ समय के लिए युवाओं को आकर्षित जरूर कर सकता है, लेकिन जब बात देश की बागडोर संभालने या ठोस नीतियां बनाने की आती है, तो यह ‘रील्स वाली क्रांति’ वास्तविकता की कसौटी पर विफल साबित होती है।
‘कॉकरोच जनता पार्टी’ जैसे प्रयोग यह तो दिखाते हैं कि सोशल मीडिया जनमत को प्रभावित करने का एक बड़ा माध्यम बन चुका है, लेकिन जब तक ये आंदोलन इंटरनेट की दुनिया से बाहर निकलकर देश की मुख्यधारा की समस्याओं और भारतीय समाज की जमीनी सच्चाइयों से नहीं जुड़ते, तब तक ये देश में कोई बड़ा राजनीतिक बदलाव या विकल्प पेश करने में असमर्थ रहेंगे।







