प्रदेश में विकास योजनाओं की हालत ऐसी हो गई है कि फाइलें तो तेजी से दौड़ रही हैं, लेकिन काम जमीन पर रेंग भी नहीं पा रहा। वर्ष 2025-26 के बजट खर्च के आंकड़े बताते हैं कि सड़क, पुल और घर-घर पानी जैसी बुनियादी योजनाएं अभी भी “प्रतीक्षा सूची” में ही हैं।
पीएचई विभाग का हाल यह है कि कुल बजट का सिर्फ 19 प्रतिशत ही खर्च हो पाया, जबकि 81 प्रतिशत राशि बिना काम के ही वापस लौटने की कगार पर है। वहीं पीडब्ल्यूडी भी 48 प्रतिशत खर्च पर अटका हुआ है, यानी आधा सफर भी पूरा नहीं हुआ। दूसरी ओर सामाजिक सुरक्षा वाली योजनाएं बजट से ज्यादा खर्च करके “ओवरटाइम” कर रही हैं।
करीब 2 लाख करोड़ के बजट में 25 प्रतिशत की बढ़ोतरी तो दिखी, लेकिन विकास की स्पीड उस बढ़ोतरी से मेल नहीं खा रही। सब्सिडी का आंकड़ा जरूर 40 हजार करोड़ तक पहुंच गया है, लेकिन सवाल यही है कि “काम की गाड़ी” आखिर कितनी चली?
अफसरों की मानें तो विकास की सबसे बड़ी रफ्तार कागजों में है डीपीआर, टेंडर, मंजूरी और एल-1 चयन में ही 4 से 6 महीने ऐसे निकल जाते हैं जैसे ये प्रक्रिया नहीं, पूरा कोर्स हो।पानी की योजनाएं भी “घर-घर जल” की जगह “घर-घर इंतजार” बन गई हैं। कई जिलों में लोग आज भी फ्लोराइडयुक्त या गंदा पानी पीने को मजबूर हैं, जबकि नल तो लगे हैं, बस “आपूर्ति” गायब है।
पीएचई का कहना है कि इस साल केंद्र से एक रुपया भी नहीं मिला, लेकिन जमीन पर लोगों को पानी तो वैसे भी “स्थायी इंतजार” में ही मिल रहा है।
अबूझमाड़ के कारकानार जैसे गांवों में हालात और भी दिलचस्प हैं नल तो हैं, लेकिन पानी नहीं। योजना है, लेकिन परिणाम नहीं। यानी विकास पूरी तरह “इंस्टॉल” है, बस “स्टार्ट” बटन दबना बाकी है।
19 प्रतिशत खर्च अपने आप में जवाब है कि विभाग योजना बनाने में जितना तेज है, उसे लागू करने में उतना ही धीमा।
कुल मिलाकर तस्वीर यही है कि विकास योजनाएं कागजों पर तो दौड़ रही हैं, लेकिन जमीन पर अभी भी “स्टार्टिंग लाइन” पर खड़ी हैं।



