राजनीति में अक्सर कहा जाता है कि बजट जिसके पास है, पावर उसके पास है, लेकिन ओपी चौधरी ने इस परिभाषा को और विस्तार दिया है- बजट भी मेरा और खर्च करने वाली कलम पर पहरा भी मेरा।
छत्तीसगढ़ की प्रशासनिक गलियारों में बुधवार की रात जो 43 आईएएस अफसरों की सूची जारी हुई, वह केवल तबादलों की फेरबदल नहीं, बल्कि सत्ता के शीर्ष पर बैठे दो दिग्गजों के बीच की नूरा-कुश्ती और वर्चस्व की नई इबारत है। राजनीति के जानकार इसे सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया मान सकते हैं, लेकिन यदि इसकी गहराई में उतरें तो यह स्पष्ट रूप से वित्त मंत्री ओपी चौधरी द्वारा उपमुख्यमंत्री अरुण साव की किलाबंदी नजर आती है।
इस फेरबदल का सबसे दिलचस्प और विवादास्पद पहलू यह है कि उपमुख्यमंत्री अरुण साव के सबसे भारी-भरकम विभागों- लोक निर्माण (PWD) और लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी (PHE) में अब उन अफसरों की एंट्री हुई है, जो सीधे तौर पर ओपी चौधरी की गुड बुक्स में शामिल हैं। मुकेश कुमार बंसल का PWD में जाना महज एक संयोग नहीं हो सकता। वित्त मंत्रालय में ओपी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करने वाले बंसल अब साव के विभाग की फाइलों का हिसाब रखेंगे। राजनीतिक हलकों में इसे साव की स्वायत्तता पर सर्जिकल स्ट्राइक कहा जा रहा है।
एक पूर्व आईएएस होने के नाते ओपी चौधरी जानते हैं कि सत्ता की असली लगाम अमले के हाथ में होती है। अपनी पसंद के अफसरों को अहम पदों पर बैठाकर उन्होंने एक ऐसा सुपर-सचिवालय खड़ा कर दिया है, जहाँ विभाग भले ही किसी और मंत्री का हो, लेकिन इनपुट और आउटपुट का कंट्रोल रूम एक ही जगह है। जल जीवन मिशन जैसे अरबों के प्रोजेक्ट वाले विभाग में पसंदीदा अफसरों की तैनाती यह बताती है कि अब खर्च करने वाला हाथ (साव) और तिजोरी की चाबी रखने वाली नजर (ओपी) के बीच सीधा टकराव या कड़ा पहरा रहने वाला है।
लोकतंत्र में चेक एंड बैलेंस जरूरी है, लेकिन जब यह बैलेंस किसी एक मंत्री के कद को छोटा करने या उसे प्रशासनिक चक्रव्यूह में घेरने के लिए इस्तेमाल होने लगे, तो सरकार के भीतर अंतर्विरोध जन्म लेते हैं। अरुण साव, जो संगठन और सत्ता दोनों में एक बड़ा चेहरा हैं, उनके विभागों में निगरानी के इस मॉडल ने यह संकेत दे दिया है कि सरकार में नंबर 2 की असली हैसियत अब प्रोटोकॉल से नहीं, बल्कि प्रशासनिक पकड़ से तय हो रही है।
यदि यह घेराबंदी वित्तीय अनुशासन के नाम पर विकास की गति रोकती है या मंत्रियों के बीच अविश्वास की खाई पैदा करती है, तो इसका खामियाजा प्रदेश की जनता को भुगतना होगा। ओपी चौधरी ने अपनी बिसात बिछा दी है और साव के विभागों में अपने सिपहसालार तैनात कर दिए हैं। अब सवाल यह है कि क्या अरुण साव इस प्रशासनिक घेराबंदी को स्वीकार करेंगे या अपनी सियासी जमीन बचाने के लिए कोई नया पलटवार करेंगे?







