पश्चिम बंगाल चुनावी रण में छत्तीसगढ़ के भाजपा मंत्री खुशवंत गुरु पर सरकारी तंत्र को पार्टी प्रचार का औज़ार बनाने का बेहद गंभीर आरोप लगा है। सवाल यह है कि जब बंगाल में आदर्श आचार संहिता लागू थी, तब मंत्री अपने साथ सरकारी सुरक्षाकर्मी भागवत सेन, कैलाश साहू और ओएसडी सुशांत राय को किस अधिकार, किस नियम और किस अनुमति के तहत भाजपा प्रचार में लेकर पहुंचे? अगर इन कर्मचारियों को निर्वाचन आयोग की विधिवत मंजूरी नहीं मिली थी, तो यह केवल एक चूक नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मर्यादा और चुनावी निष्पक्षता पर सीधा हमला है।
सरकारी सुरक्षा का काम जनप्रतिनिधि की जान-माल की हिफाजत करना है, न कि सत्ताधारी दल के लिए चुनावी मैदान सजाना। लेकिन आरोप यही है कि सरकारी अमला मंत्री के साथ बंगाल की चुनावी सभाओं में सक्रिय दिखा, और यही वह बिंदु है जहां पूरा मामला बेहद संदिग्ध, अनुचित और दंडनीय बन जाता है।
यदि अनुमति के बिना सरकारी कर्मचारी प्रचार में लगाए गए, तो यह आदर्श आचार संहिता की खुली अवहेलना है और इस पर केवल बयानबाज़ी नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई होनी चाहिए।

विपक्ष का यह कहना पूरी तरह वाजिब है कि मंत्री पद का इस्तेमाल निजी राजनीतिक लाभ के लिए नहीं किया जा सकता। अगर सरकारी सुरक्षाकर्मी और ओएसडी चुनावी भीड़ का हिस्सा बनकर भाजपा के पक्ष में काम करते रहे, तो यह सत्ता की बेशर्मी और नियमों की हनक दोनों का उदाहरण है। निर्वाचन आयोग को इस पूरे प्रकरण में नरमी नहीं, सख्ती दिखानी चाहिए, क्योंकि अगर ऐसे मामलों पर समय रहते शिकंजा नहीं कसा गया तो फिर आचार संहिता केवल कागज़ी औपचारिकता बनकर रह जाएगी।
यह सिर्फ एक मंत्री पर नहीं, बल्कि सत्ता के उस सोच पर सवाल है जो सरकारी संसाधनों को अपनी चुनावी ढाल समझ बैठती है। लोकतंत्र में मंत्री हों या अफसर, कानून सबके लिए बराबर है—और अगर खुशवंत गुरु के मामले में अनुमति के बिना सरकारी कर्मचारी प्रचार में जुटे पाए गए, तो यह मामला सीधी जवाबदेही, जांच और सजा तक जाना चाहिए।



