संसद और विधानसभाओं में 33% महिला आरक्षण को 2029 से लागू करने की तैयारी के बीच राजनीतिक माहौल गरमा गया है। सरकार लोकसभा में संविधान संशोधन, परिसीमन बिल-2026 और दिल्ली, जम्मू-कश्मीर-पुडुचेरी में लागू करने से जुड़े तीन अहम बिल पेश कर रही है। इस पर 16-17 अप्रैल को लोकसभा और 18 अप्रैल को राज्यसभा में चर्चा तय है।
इसी बीच कांग्रेस के वरिष्ठ नेता Kamal Nath ने इस पूरे मुद्दे पर गंभीर सवाल उठाते हुए सरकार की मंशा और प्रक्रिया दोनों पर निशाना साधा है। उनका कहना है कि महिला आरक्षण जरूरी है, लेकिन इसे लागू करने का तरीका पूरी तरह निष्पक्ष और अद्यतन आंकड़ों पर आधारित होना चाहिए।
कमलनाथ ने साफ कहा कि 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन करना आज के भारत की वास्तविक तस्वीर को नहीं दर्शाता। “एक दशक पुराने आंकड़ों पर प्रतिनिधित्व तय करना न्याय के सिद्धांत के खिलाफ है।” उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि जब सरकार खुद 2029 से आरक्षण लागू करने की बात कर रही है, तो नई जनगणना कराने में देरी क्यों की जा रही है।
उनके मुताबिक पिछले 10 साल में जनसंख्या का वितरण, सामाजिक संरचना और क्षेत्रीय समीकरण काफी बदल चुके हैं। ऐसे में पुराने डेटा के आधार पर आरक्षण तय करना कई वर्गों के साथ अन्याय कर सकता है।
इस मुद्दे पर सरकार और विपक्ष आमने-सामने हैं। सरकार का कहना है कि परिसीमन के बाद सीटें बढ़ेंगी और किसी राज्य का नुकसान नहीं होगा, जबकि विपक्ष, खासकर Rahul Gandhi, 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन को स्वीकार करने के पक्ष में नहीं हैं। वहीं बसपा ने 33% आरक्षण में SC-ST महिलाओं के लिए अलग कोटा देने की मांग की है।
कमलनाथ ने यह भी माना कि महिला आरक्षण से महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी, शासन में पारदर्शिता आएगी और सामाजिक संतुलन मजबूत होगा। लेकिन उन्होंने दोहराया कि “सही प्रक्रिया के बिना अच्छा कदम भी विवादित बन जाता है।”
उन्होंने सुझाव दिया कि सरकार पहले नई जनगणना पूरी कराए, फिर निष्पक्ष परिसीमन करे और उसके बाद महिला आरक्षण लागू करे। तभी यह कदम वास्तव में ऐतिहासिक और न्यायपूर्ण माना जाएगा।



