रायपुर। छत्तीसगढ़ के विश्वविद्यालयों में प्रशासनिक और वित्तीय अनियमितताओं को लेकर इन दिनों एक अजीब स्थिति बनती दिख रही है। पिछले कुछ महीनों में कई विश्वविद्यालयों के प्रभारी कुलसचिवों के खिलाफ कार्रवाई हुई है, लेकिन इन फैसलों के पीछे कुलपतियों की भूमिका को लेकर अब तक कोई स्पष्ट जवाब सामने नहीं आया है। यही कारण है कि शिक्षा जगत में उच्च शिक्षा विभाग की कार्यशैली पर सवाल उठने लगे हैं।
राज्य के विश्वविद्यालयों की स्थिति भी चिंताजनक है। प्रदेश में कुल 15 शासकीय विश्वविद्यालय हैं, लेकिन इनमें नियमित कुलसचिवों की संख्या बेहद कम है। वर्तमान में केवल दो ही नियमित कुलसचिव पदस्थ हैं, जिनमें से एक उच्च शिक्षा संचालनालय में कार्यरत हैं। अधिकांश विश्वविद्यालयों में प्रभारी व्यवस्था के सहारे प्रशासनिक कामकाज चल रहा है।
इसी बीच हाल के महीनों में विभिन्न विश्वविद्यालयों में प्रभारी कुलसचिवों के खिलाफ हुई कार्रवाई ने बहस को और तेज कर दिया है। शिक्षा जगत से जुड़े लोग सवाल उठा रहे हैं कि यदि किसी विश्वविद्यालय में अनियमितताएं हुई हैं, तो उनकी जवाबदेही सिर्फ कुलसचिवों तक ही क्यों सीमित दिखाई दे रही है।
सबसे पहले मामला छत्तीसगढ़ स्वामी विवेकानंद तकनीकी विश्वविद्यालय (CSVTU), भिलाई का सामने आया। यहां परिवारवाद, भ्रष्टाचार और अयोग्य महाविद्यालयों को मान्यता देने जैसे आरोपों के बाद प्रभारी कुलसचिव डॉ. अंकित अरोरा को पद से हटाकर उनकी मूल पदस्थापना शासकीय इंजीनियरिंग कॉलेज अंबिकापुर भेज दिया गया। उस समय विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति की भूमिका पर भी सवाल उठे थे, लेकिन उनके खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई सामने नहीं आई।
इसके बाद पंडित सुंदरलाल शर्मा (मुक्त) विश्वविद्यालय, बिलासपुर में आठ पदों पर भर्ती में कथित अनियमितता और विधानसभा में भ्रामक जानकारी देने के आरोप में कुलसचिव डॉ. भुवन सिंह राज को निलंबित कर दिया गया। भर्ती जैसी महत्वपूर्ण प्रक्रिया में प्रशासनिक निगरानी को लेकर भी कई सवाल खड़े हुए।
इसी तरह राजकुमारी इन्दिरा सिंह कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ में कर्मचारियों के विरोध प्रदर्शन के बाद प्रभारी कुलसचिव सौमित्र तिवारी का तबादला कर दिया गया। इस घटनाक्रम ने भी विश्वविद्यालय प्रशासन में समन्वय और जवाबदेही को लेकर चर्चा को जन्म दिया।
ताजा मामला अटल बिहारी वाजपेयी विश्वविद्यालय, बिलासपुर का है, जहां कुलसचिव शैलेन्द्र दुबे को विश्वविद्यालय मद की राशि में कथित गड़बड़ी, जेम पोर्टल के माध्यम से सामग्री खरीद में आर्थिक अनियमितता और छत्तीसगढ़ भंडार क्रय नियम 2002 (संशोधित 2025) के उल्लंघन के आरोप में निलंबित किया गया है। निलंबन आदेश में छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (आचरण) नियम 1965 के उल्लंघन का भी उल्लेख किया गया है।
इन सभी मामलों के बाद अब एक बड़ा सवाल उठ रहा है कि विश्वविद्यालयों में होने वाले प्रशासनिक और वित्तीय निर्णयों की अंतिम जिम्मेदारी किसकी होती है। विश्वविद्यालय अधिनियम के अनुसार कुलपति संस्थान के मुख्य कार्यपालक और प्रशासनिक प्रमुख होते हैं। ऐसे में अनियमितताओं के मामलों में उनकी जवाबदेही को लेकर चर्चा स्वाभाविक है।

इधर शहीद नंदकुमार पटेल विश्वविद्यालय, रायगढ़ भी चर्चाओं में आ गया है। विश्वविद्यालय से जुड़े सूत्रों का दावा है कि यहां जेम पोर्टल के माध्यम से उपकरणों और सामग्रियों की खरीद को लेकर सवाल उठ रहे हैं। चर्चा यह भी है कि कुछ खरीद ऐसी फर्मों से की गई हैं जिनके खिलाफ अन्य विश्वविद्यालयों में कार्रवाई हो चुकी है।
ऐसे में शिक्षा जगत में यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि यदि समान प्रकृति के आरोपों पर अन्य विश्वविद्यालयों में त्वरित कार्रवाई हो रही है, तो रायगढ़ विश्वविद्यालय के मामलों की जांच अब तक क्यों नहीं हुई। क्या यह महज संयोग है या प्रशासनिक स्तर पर किसी प्रकार की नरमी?
यह भी चर्चा है कि कार्यकाल समाप्ति के बाद भी कुलपति प्रो. पटेरिया को लेकर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही। इससे यह सवाल और गहरा गया है कि क्या उच्च शिक्षा विभाग की कार्रवाई केवल अधीनस्थ अधिकारियों तक ही सीमित है, या फिर पूरे मामले की व्यापक जांच की जरूरत है।



