राज्यसभा सांसद राघव मोहन दास ने विदेश में रहने वाले भारतीयों और भारत में अकेले रह रहे उनके माता-पिता की स्थिति को लेकर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि करीब 3.5 करोड़ भारतीय विदेशों में रह रहे हैं, जबकि उनके माता-पिता देश में अकेले जीवन गुजार रहे हैं।
सांसद ने कहा कि जो बच्चे पढ़ाई या नौकरी के लिए विदेश जाते हैं, वे ज्यादातर अपने माता-पिता की मेहनत और कमाई के सहारे वहां तक पहुंचते हैं। शुरुआती समय में वे माता-पिता की चिंता करते हैं, लेकिन समय के साथ उनका लगाव कम होता जाता है। उन्होंने इंदौर और दिल्ली की ऐसी घटनाओं का जिक्र किया, जहां बुजुर्ग माता-पिता की मौत के बाद भी उनके बच्चे विदेश से लौटकर नहीं आए। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2024-25 में ऐसे लगभग 500 मामले सामने आए।
राघव मोहन दास ने कहा कि 2007 का Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens Act पर्याप्त प्रभावी नहीं है। इसलिए उन्होंने सरकार से नया नियम बनाने की मांग की है। उनके सुझावों में शामिल है—
* विदेश जाने वाले बच्चों से शपथपत्र लिया जाए कि वे अपनी आय का तय हिस्सा माता-पिता को देंगे।
* बुजुर्गों की देखभाल के लिए केयरटेकर नियुक्त करना अनिवार्य किया जाए।
* कम से कम सप्ताह में एक बार माता-पिता से बात करना जरूरी हो।
* हर 6 महीने में माता-पिता से “देखभाल प्रमाणपत्र” लिया जाए।
* नियमों का पालन न करने पर पासपोर्ट रद्द करने का प्रावधान हो।
सांसद ने कहा कि जीवन के अंतिम समय में बुजुर्गों को अकेले और पीड़ा में मरना न पड़े, इसके लिए कड़े कानूनी प्रावधान जरूरी हैं।







