नहीं थमे थे विश्वविद्यालयों में जातिगत नफरत, यूजीसी बिल को लाना छात्रों को मौत के आग में धकेलने जैसा?

Madhya Bharat Desk
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प्रस्तावित यूजीसी बिल ऐसे वक्त में सामने आया है, जब देश के विश्वविद्यालय केवल अकादमिक नहीं, बल्कि गहरे वैचारिक और सामाजिक संकट से गुजर रहे हैं। मुद्दा सिर्फ प्रशासनिक नियंत्रण या नियमन का नहीं है, बल्कि छात्रों की सुरक्षा, समान अधिकार और कैंपस में लगातार बढ़ती वैचारिक नफरत पर प्रभावी रोक का है।

खासकर स्वर्ण समाज के छात्रों के बीच यह आशंका तेजी से गहराती जा रही है कि कहीं यह बिल भी पहले से मौजूद चयनात्मक नैतिकता को और मजबूत करने का जरिया न बन जाए।

अगर जातिवाद और भेदभाव के खिलाफ कानून बनाए जाने हैं, तो उनका दायरा हर जाति, हर समुदाय और हर विचारधारा तक समान रूप से होना चाहिए। किसी भी वर्ग के खिलाफ नफरत, धमकी, सामाजिक बहिष्कार या हिंसा—चाहे वह किसी भी नाम या विचार के तहत हो—सीधे आपराधिक श्रेणी में आना चाहिए।

कानून का तराजू अगर जाति देखकर झुकने लगे, तो वह न्याय नहीं, बल्कि राजनीतिक सुविधा बनकर रह जाता है।

यही चिंता देश के तथाकथित प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों की हालिया घटनाओं से और गंभीर हो जाती है। वर्ष 2024 में अशोका यूनिवर्सिटी से जुड़े उन वीडियो ने व्यापक बहस छेड़ी, जिनमें “ब्राह्मण-बनियावाद मुर्दाबाद” जैसे नारे लगाए जाने का दावा किया गया। इससे पहले 2022 में जेएनयू की दीवारों पर लिखे गए नारे—“ब्राह्मण परिसर छोड़ो”, “रक्तपात होगा”, “ब्राह्मण भारत छोड़ो”—इस बात का संकेत थे कि कैंपस में नफरत अब छिपी हुई नहीं, बल्कि खुलकर सामने आ चुकी है।

सबसे अहम सवाल यह है कि विश्वविद्यालय प्रशासन को यह सब दिखाई क्यों नहीं देता?

क्या यह केवल लापरवाही है, या फिर एक सुनियोजित चुप्पी?

जब किसी खास समुदाय के खिलाफ खुलेआम हिंसा की धमकियां दी जाती हैं, तो जांच और कार्रवाई की प्रक्रिया ठंडी क्यों पड़ जाती है? क्या अब कानून का इस्तेमाल भी पीड़ित की जाति देखकर तय किया जाएगा?

वास्तविकता यह है कि कई विश्वविद्यालयों में एक ऐसा वैचारिक समूह सक्रिय है, जिसका उद्देश्य न तो शिक्षा है और न ही सामाजिक सुधार। इसका मकसद केवल उकसावे, टकराव और विभाजन को बढ़ावा देना है। नफरत को “विचारधारा” का जामा पहनाकर वैध ठहराने की कोशिश की जा रही है।

जब निशाना स्वर्ण समाज बनता है, तो या तो मामलों को नजरअंदाज कर दिया जाता है या फिर बौद्धिक तर्कों की आड़ में सही ठहराया जाता है। यही चयनात्मक रवैया विश्वविद्यालयों को भीतर से खोखला कर रहा है।

एएमयू, जामिया मिलिया इस्लामिया और जादवपुर यूनिवर्सिटी जैसे संस्थानों को लेकर भी समय-समय पर आरोप लगते रहे हैं कि वहां स्वर्ण समाज के छात्रों को वैचारिक दबाव, अपमान और असुरक्षा का सामना करना पड़ता है। बावजूद इसके, सरकार और नियामक संस्थाएं अक्सर इन मामलों को “छोटा विवाद” बताकर किनारे कर देती हैं।

सवाल यह है कि क्या यह सब वोट बैंक की राजनीति के चलते हो रहा है? और क्या देश का भविष्य—यानी छात्र—सिर्फ चुनावी गणित का मोहरा बनकर रह गया है?

विश्वविद्यालय समाज को जोड़ने के केंद्र होने चाहिए, न कि नफरत और डर फैलाने के अड्डे। अगर कैंपस का माहौल भय और असुरक्षा से भरा रहेगा, तो शिक्षा का मूल उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा।

यूजीसी बिल पर बहस जरूरी है, लेकिन उससे कहीं ज्यादा जरूरी यह सुनिश्चित करना है कि कानून हर नागरिक और हर छात्र के लिए समान हो।

वरना आने वाली पीढ़ी यही मानेगी कि इस देश में न्याय नहीं, बल्कि सुविधा और राजनीति का राज है—और किसी भी लोकतंत्र के लिए इससे बड़ा खतरा शायद ही कुछ और हो।

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