सबरीमाला भारत के सबसे प्राचीन और श्रद्धा से जुड़े मंदिरों में गिना जाता है, जहां हर वर्ष करोड़ों श्रद्धालु कठिन व्रत और यात्रा के बाद दर्शन के लिए पहुंचते हैं। यह मंदिर केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि सदियों पुरानी परंपरा और विश्वास का प्रतीक भी है।
इसी पवित्र स्थल से जुड़ा एक गंभीर मामला अब सामने आया है। केरल हाई कोर्ट ने सबरीमाला मंदिर से जुड़ी कथित गड़बड़ियों पर बेहद सख्त टिप्पणी करते हुए साफ कहा है कि यह कोई सामान्य लापरवाही या दुर्घटना नहीं थी, बल्कि एक सुनियोजित और लंबे समय तक चलने वाली प्रक्रिया का हिस्सा थी। कोर्ट के अनुसार, यह मामला योजनाबद्ध तरीके से अंजाम दिया गया और इसमें सिस्टम के भीतर मौजूद कई लोगों की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता।
विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर (VSSC) में कराए गए वैज्ञानिक परीक्षणों ने चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। जांच में यह पुष्टि हुई कि मंदिर में लगी ओरिजिनल गोल्ड प्लेटिंग को हटाकर उसकी जगह घटिया गुणवत्ता वाला अन्य धातु मिश्रण लगाया गया। यानी श्रद्धालुओं द्वारा अर्पित सोने को निकालकर उसकी जगह नकली या कम गुणवत्ता की प्लेटिंग की गई।
इस मामले में 20 जनवरी को प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने मनी लॉन्ड्रिंग एंगल से कार्रवाई तेज करते हुए केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु में एक साथ बड़े पैमाने पर छापेमारी शुरू की। कुल 21 स्थानों पर चल रही इन रेड्स में आरोपियों के घर, कार्यालय और उनसे जुड़े संस्थानों को शामिल किया गया है। सूत्रों के अनुसार, इन छापों के बाद ED संपत्तियों को अटैच करने की प्रक्रिया भी शुरू कर सकता है।
गौरतलब है कि दिसंबर 2025 में हाई कोर्ट ने ED को इस मामले में स्वतंत्र जांच की अनुमति दी थी, जबकि पहले स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) ने ED की एंट्री का विरोध किया था। कोर्ट ने उस आपत्ति को खारिज कर दिया। इसी बीच SIT ने भी सबरीमाला श्राइन का निरीक्षण किया है।
VSSC की रिपोर्ट में बताया गया कि 1998 में लगाई गई हाई-क्वालिटी गोल्ड क्लैडिंग को 2019 के रेनोवेशन के दौरान हटाकर कॉपर और लो-ग्रेड प्लेटिंग से बदल दिया गया, जिसमें निकल सहित अन्य धातुओं का इस्तेमाल हुआ।
जांच में यह भी सामने आया है कि मंदिर की अन्य संपत्तियों के साथ भी इसी तरह की गड़बड़ियां हुई हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि यह कोई एकल मामला नहीं, बल्कि मंदिर प्रबंधन तंत्र के भीतर चल रहे संगठित दुरुपयोग का हिस्सा हो सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि राज्य सरकार के नियंत्रण में आने वाले मंदिरों की सुरक्षा, वित्तीय ऑडिट और संरक्षण की जिम्मेदारी सरकार की होती है। ऐसे में इतने बड़े घोटाले सामने आने के बावजूद न तो सिस्टम में कोई ठोस सुधार दिख रहा है और न ही अब तक कड़ी जवाबदेही तय हो पाई है।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—यदि ऐसा मामला किसी मस्जिद या चर्च से जुड़ा होता, तो क्या सरकार उसी तरह नियंत्रण अपने हाथ में रखती? यह बहस अब केवल राजनीति तक सीमित नहीं, बल्कि समानता और सेक्युलरिज़्म की व्याख्या पर भी सवाल उठा रही है।
हाई कोर्ट की टिप्पणियों से साफ है कि इस कथित सोने की चोरी में अधिकारियों, ठेकेदारों और व्यापारियों का एक पूरा नेटवर्क शामिल हो सकता है। यह पहली बार नहीं है जब मंदिर संपत्ति से जुड़ी अनियमितताएं सामने आई हों। इससे पहले पद्मनाभस्वामी मंदिर का मामला भी चर्चा में रह चुका है।
यह केवल आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि श्रद्धालुओं की आस्था और मंदिर की पवित्रता पर सीधा आघात माना जा रहा है। अदालत ने भी संकेत दिया है कि यह मामला गहरी और पुरानी खामियों की ओर इशारा करता है, जिन पर अब गंभीर स्तर पर पुनर्विचार की आवश्यकता है।







