उत्तर प्रदेश की राजनीति में नए साल की शुरुआत एक अनोखे सियासी स्वाद के साथ हुई है। समाजवादी पार्टी मुख्यालय में आयोजित ‘बाटी-चोखा’ भोज ने न केवल राजनीतिक हलचल बढ़ा दी, बल्कि भाजपा के भीतर चल रहे जातिगत और संगठनात्मक तनाव को भी सतह पर ला दिया है। इस दावत को सीधे तौर पर भाजपा के ‘ब्राह्मण नेताओं बनाम संगठन’ विवाद से जोड़कर देखा जा रहा है।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, 1 जनवरी को सपा कार्यालय में हुए इस आयोजन के दौरान अखिलेश यादव ने भाजपा पर अप्रत्यक्ष हमला बोला। उन्होंने कहा कि बाटी-चोखा उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान है और इसे राजनीति या आपसी खींचतान का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए। अखिलेश ने जोर देकर कहा कि समाज में सभी को बराबरी के साथ बैठकर भोजन करने का अधिकार है और इस पर किसी तरह की रोक गलत है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अखिलेश का यह बयान भाजपा के उन ब्राह्मण विधायकों और विधान परिषद सदस्यों के समर्थन में माना जा रहा है, जिन्हें हाल ही में पार्टी ने चेतावनी दी थी। दरअसल, ये नेता पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के पारंपरिक व्यंजन ‘बाटी-चोखा’ के बहाने एक सामाजिक बैठक में शामिल हुए थे, जिसे भाजपा नेतृत्व ने अनुशासनहीनता और जाति आधारित गतिविधि करार दिया था।
विवाद की जड़ क्या है?
करीब एक सप्ताह पहले उत्तर प्रदेश भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने कुछ ब्राह्मण विधायकों और एमएलसी को कारण बताओ नोटिस जारी किया था। पार्टी का आरोप था कि ये नेता संगठन की अनुमति के बिना एक जाति विशेष से जुड़े कार्यक्रम में शामिल हुए। इस फैसले पर पार्टी के भीतर भी असहमति देखने को मिली। पूर्व सांसद ब्रजभूषण शरण सिंह समेत कई नेताओं ने सवाल उठाया कि जब राजनीतिक दल खुद जातीय सम्मेलन करते हैं, तो सामूहिक भोजन पर आपत्ति क्यों?
अखिलेश की रणनीति क्या है?
विश्लेषकों के अनुसार, सपा प्रमुख ने ‘बाटी-चोखा’ को सियासी हथियार बनाकर दोहरे संदेश देने की कोशिश की है।
पहला—भाजपा के उन ब्राह्मण नेताओं के प्रति सहानुभूति दिखाना, जो संगठन की सख्ती से असंतुष्ट हैं।
दूसरा—पूर्वी यूपी की सांस्कृतिक पहचान को सामने रखकर खुद को जमीन से जुड़ा और भाजपा को सख्त व दूर दिखाना।
कुल मिलाकर, ‘बाटी-चोखा’ अब सिर्फ एक व्यंजन नहीं रहा, बल्कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में जाति, संस्कृति और सत्ता की नई बहस का प्रतीक बन गया है।







