जगदलपुर। बस्तर में माओवादी हिंसा का चार दशक पुराना इतिहास इन दिनों बेहद तेज़ी से बदल रहा है। दंडकारण्य के सबसे खौफनाक और रणनीतिक कमांडर हिड़मा की मुठभेड़ में मौत के बाद संगठन की नींव हिल चुकी है। इसके तुरंत बाद शीर्ष नेताओं भूपति और रूपेश का आत्मसमर्पण माओवादी ढांचे के लिए ऐसा झटका साबित हुआ जिसने कैडरों के हौसले को पूरी तरह कमजोर कर दिया। इसी बदलाव का असर है कि पिछले केवल 10 दिनों में तीन करोड़ रुपये से अधिक इनामी 161 माओवादी सुकमा, बीजापुर, नारायणपुर और तेलंगाना क्षेत्र में हथियार डाल चुके हैं। सुरक्षा एजेंसियां इसे बस्तर की धरती पर उभरती ‘आत्मसमर्पण की सुनामी’ बता रही हैं, जो माओवादी आंदोलन के इतिहास में अभूतपूर्व है।
इसी बीच महाराष्ट्र-मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ (एमएमसी) स्पेशल जोनल कमेटी की ओर से आया नया संदेश संगठन में चल रही भारी टूट और असमंजस को उजागर करता है। संगठन के प्रवक्ता ‘अनंत’ ने पत्र और ऑडियो संदेश जारी कर 1 जनवरी 2026 को सामूहिक आत्मसमर्पण का ऐलान किया है। पहले फरवरी तक का समय मांगा गया था, लेकिन छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री की प्रतिक्रिया के बाद तारीख घटाकर 1 जनवरी कर दी गई। संदेश में कैडरों को अभियान में शामिल न होने, आंतरिक संपर्क बनाए रखने और रोज सुबह 11 से 11:15 बजे 435.715 फ्रीक्वेंसी पर जुड़े रहने का निर्देश दिया गया है। अनंत के बयान से साफ है कि राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के बदलने, वैचारिक पकड़ कमजोर पड़ने और विश्वसनीय नेतृत्व के खत्म होने से संगठन की जड़ें खोखली हो चुकी हैं। माओवादियों ने तीनों राज्यों से 1 जनवरी 2026 तक अभियान रोकने की मांग की है और चेताया है कि यदि गिरफ्तारियां व मुठभेड़ जारी रहीं तो सामूहिक सरेंडर प्रभावित होगा।
जमीनी पत्रकारों का मानना है कि बसवा राजू और हिड़मा जैसे बड़े नेताओं की मौत ने संगठन के अंदर नेतृत्व का ऐसा संकट पैदा किया है जिसने कैडरों का मनोबल तोड़ दिया है। इसी माहौल के बीच बुधवार को दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी के कुख्यात नेता, 25 लाख के इनामी चैतू उर्फ श्याम दादा ने नौ अन्य साथियों के साथ बस्तर के शौर्य भवन में सरेंडर किया। कुल 65 लाख रुपये के इनामी ये 10 माओवादी अब मुख्यधारा में लौटकर पुनर्वास की राह पकड़ चुके हैं। 63 वर्षीय चैतू, जो 1985 से संगठन में सक्रिय था और झीरम घाटी हमले में भी शामिल था, उसका आत्मसमर्पण माओवादी ढांचे के लिए एक और बड़ा झटका माना जा रहा है। इसके साथ 8 लाख के इनामी सरोज, 5 लाख इनामी भूपेश, प्रकाश, कमलेश, जन्नी, संतोष, रामशीला और 1 लाख इनामी नवीन व जयंती ने भी संविधान की किताब थामकर शांति का रास्ता चुना।
चैतू ने कहा कि भूपति और रूपेश के सरेंडर ने उन्हें सोचने पर मजबूर किया और अब हथियारों की लड़ाई का समय खत्म हो चुका है। रूपेश ने भी बाकी कैडरों से जंगल छोड़कर जीवन को अपनाने की अपील की। बस्तर रेंज के आईजी सुंदरराज पी. का कहना है कि माओवादी संगठन का प्रभाव तेजी से खत्म हो रहा है और बस्तर में शांति और विकास का एक नया अध्याय उभर रहा है। उन्होंने देवजी, रामदर और पापाराव जैसे बड़े नेताओं से भी समर्पण की अपील की है।







