नाकामी या सोची-समझी साज़िश ? बीएलओ की मौतों पर सियासी तूफ़ान

Madhya Bharat Desk
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देश के विभिन्न राज्यों में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान बूथ स्तर अधिकारियों (BLOs) की लगातार हो रही मौतों ने राजनीतिक माहौल गरमा दिया है। कांग्रेस पार्टी ने भाजपा और चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए हैं और कहा है कि अनियोजित कार्यभार और दमनकारी व्यवस्था के कारण बीएलओ की जानें जा रही हैं, जिन्हें सामान्य मौत बताकर दबा दिया जा रहा है।

राहुल गांधी ने इस मामले पर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को घेरते हुए कहा कि पूरे देश में एसआईआर प्रक्रिया के नाम पर अफरा-तफरी मचा दी गई है, और सिर्फ तीन हफ्तों में 16 बीएलओ की मौत हो चुकी है। उन्होंने कहा कि ये मौतें दिल का दौरा, तनाव और आत्महत्या जैसे कारणों से हुई हैं, और यह घटना किसी नाकामी का परिणाम नहीं बल्कि एक सोचा-समझा षड्यंत्र है। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग ने ऐसी प्रणाली बनाई है जिसमें लोगों को अपने नाम की पुष्टि करने के लिए 22 साल पुरानी स्कैन की गई मतदाता सूचियाँ खंगालनी पड़ रही हैं, ताकि नागरिक थककर हार मान जाएं और ‘वोट चोरी’ निर्बाध जारी रहे। उनके अनुसार यदि नीयत साफ होती तो मतदाता सूची पूरी तरह डिजिटल, सर्चेबल और मशीन-रीडेबल होती, न कि कागजों के जंगल में फंसी हुई।

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने भी भाजपा पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि वोट चोरी अब जानलेवा रूप ले चुकी है। काम के अत्यधिक दबाव के कारण बीएलओ आत्महत्या करने पर मजबूर हो रहे हैं, और इन मौतों की वास्तविक संख्या रिपोर्ट से कहीं अधिक है। उन्होंने कहा कि भाजपा चोरी की सत्ता का आनंद ले रही है और चुनाव आयोग मूकदर्शक बनकर सिर्फ तमाशा देख रहा है। खरगे ने चेतावनी दी कि यदि अभी भी लोग चुप रहे तो लोकतंत्र के आखिरी स्तंभ भी गिर जाएंगे।

विवाद उस समय और गहरा गया जब पश्चिम बंगाल के नदिया जिले में एक महिला बीएलओ अपने घर में पंखे से लटकी मिलीं। परिवार का कहना है कि एसआईआर कार्य के दबाव ने उन्हें मानसिक तनाव में डाल दिया। उनके कथित सुसाइड नोट में चुनाव आयोग को जिम्मेदार ठहराया गया है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इसे बेहद चिंताजनक बताते हुए इस मामले पर कड़ा रुख दिखाया, जबकि भाजपा नेता राहुल सिन्हा ने इस सुसाइड नोट को फर्जी बताया। इसी बीच मध्य प्रदेश के रायसेन और दमोह जिलों में एसआईआर में नियुक्त दो शिक्षकों की भी बीमारी के चलते मौत हो गई।

बीएलओ की ये लगातार मौतें अब राष्ट्रव्यापी सवाल बन चुकी हैं—क्या यह प्रशासनिक नाकामी है, या जैसा विपक्ष आरोप लगा रहा है, लोकतंत्र को कमजोर करने की साज़िश?

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