बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में संख्या बल की राजनीति ने कायस्थ बिरादरी की सियासी पकड़ को कमजोर कर दिया है। राज्य को दो मुख्यमंत्री और देश को पहला राष्ट्रपति देने वाली इस प्रबुद्ध बिरादरी को इस बार दोनों प्रमुख गठबंधनों से सिर्फ तीन टिकट मिले हैं।
राजनीति में अपनी बौद्धिक छवि और प्रभाव के लिए प्रसिद्ध कायस्थ समाज अब सियासी गणित का शिकार होता दिख रहा है। महागठबंधन में कांग्रेस ने केवल एक उम्मीदवार को मौका दिया है, जबकि एनडीए से भाजपा और जदयू ने एक-एक प्रत्याशी को टिकट दिया है।
महज तीन प्रत्याशी मैदान में:
भाजपा ने इस बार अपने दो सीटिंग विधायक—कुम्हरार से अरुण सिन्हा और नरकटियागंज से रश्मि वर्मा—का टिकट काट दिया है। पार्टी ने केवल मंत्री नितिन नबीन को उम्मीदवार बनाया है।
वहीं जदयू ने एकमात्र कायस्थ उम्मीदवार को टिकट दिया है।
महागठबंधन में कांग्रेस ने गया शहर से मोहन श्रीवास्तव को मैदान में उतारा है।
राजद, वाम दल और अन्य सहयोगी पार्टियों ने कायस्थ बिरादरी को कोई प्रतिनिधित्व नहीं दिया।
अन्य सवर्ण बिरादरी को मिला ज्यादा मौका:
इस चुनाव में दोनों गठबंधनों ने सवर्ण वर्ग के 124 उम्मीदवारों को टिकट दिया है, लेकिन इनमें कायस्थ बिरादरी के केवल 3 चेहरे हैं।
राजग ने 85 सवर्ण प्रत्याशी उतारे हैं, जिनमें कायस्थ केवल दो हैं, जबकि महागठबंधन ने 39 सवर्णों में से एक कायस्थ उम्मीदवार को उतारा है।
कभी सियासत की धुरी रही बिरादरी:
मंडल राजनीति से पहले कायस्थ समुदाय बिहार की राजनीति का अहम केंद्र रहा है।
इस बिरादरी से के.बी. सहाय और महामाया प्रसाद सिन्हा राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके हैं।
सिन्हा ने 1967 में नाटकीय परिस्थितियों में कृषक मजदूर पार्टी के इकलौते विधायक होते हुए मुख्यमंत्री पद संभाला था।
यही बिरादरी डॉ. राजेंद्र प्रसाद, देश के पहले राष्ट्रपति और संविधान सभा के अध्यक्ष की भी रही है।
इसी बिरादरी के जयप्रकाश नारायण के ‘संपूर्ण क्रांति’ आंदोलन ने केंद्र में कांग्रेस को सत्ता से हटाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई थी।
कायस्थों का घटता सियासी प्रभाव:
सियासी समीकरणों में कायस्थ बिरादरी का प्रभाव धीरे-धीरे सीमित होता जा रहा है।
जहां पहले यह बिरादरी राज्य की नीति निर्धारण में केंद्रीय भूमिका निभाती थी, वहीं अब यह प्रतीकात्मक उपस्थिति तक सिमट गई है।







