बिहार की राजनीति में महागठबंधन के भीतर चल रही रस्साकशी के बीच वामदलों (Left Parties) का असर तेजी से बढ़ता दिख रहा है। देश के अन्य हिस्सों में जहां लेफ्ट पार्टियां कमजोर होती जा रही हैं, वहीं बिहार में उन्होंने अपनी संगठनात्मक और राजनीतिक उपस्थिति को मजबूत बना लिया है।
सूत्रों की मानें तो इस बार वामदल न केवल पहले से अधिक सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं, बल्कि उनके पारंपरिक मुद्दे — गरीबी, बेरोजगारी और सामाजिक न्याय — बिहार विधानसभा चुनाव 2025 का मुख्य एजेंडा बनते जा रहे हैं।
सीपीआई (एमएल) बनी अग्रणी ताकत
इस पूरे राजनीतिक परिदृश्य में सीपीआई (एमएल) सबसे आगे दिखाई दे रही है। पार्टी ने गांवों और कस्बों में युवाओं, किसानों और श्रमिकों को संगठित कर एक नई राजनीतिक ऊर्जा पैदा की है। वहीं सीपीआई (एम) और सीपीआई भी उसके साथ मिलकर एक वृहद वाम एकता की तस्वीर पेश कर रहे हैं।
लेफ्ट के लिए अवसर बना महागठबंधन का मतभेद
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर महागठबंधन के भीतर मतभेद और बढ़ते हैं, तो वामदलों के पास यह बड़ा मौका होगा कि वे खुद को एक वैकल्पिक राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित करें। खासकर ग्रामीण और श्रमिक वर्ग में, जहां लेफ्ट की परंपरागत पकड़ हमेशा से रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि वामदल अब सिर्फ सहयोगी दल की भूमिका में नहीं रहना चाहते, बल्कि राज्य की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाने के लिए पूरी तरह सक्रिय हैं।







