बिहार विधानसभा चुनाव से पहले महागठबंधन (राजद-कांग्रेस) में एक बार फिर मतभेदों की खाई गहराती दिख रही है। टिकट बंटवारे को लेकर दोनों दलों में तीखा टकराव सामने आया है। नतीजतन, बगावत के स्वर तेज हो गए हैं और कई नेताओं ने खुलकर नाराजगी जताई है। इसी क्रम में राजद नेता रितु जायसवाल ने पार्टी से अलग होकर निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में नामांकन दाखिल किया है।
महागठबंधन की एकजुटता पर संकट:
टिकट वितरण की प्रक्रिया ने महागठबंधन की एकता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। कांग्रेस और राजद, दोनों ही दलों में गुटबाजी और असंतोष खुलकर सामने आ रहे हैं। कांग्रेस विधायक अफाक आलम ने पार्टी नेतृत्व पर “टिकट बेचने” के गंभीर आरोप लगाए हैं। उनके और प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम के बीच की कथित ऑडियो क्लिप सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद विवाद और गहराया है।
ऑडियो में प्रदेश अध्यक्ष यह कहते सुने गए कि “खेल चल रहा है, पार्टी ऐसे नहीं चलेगी।” अफाक आलम का आरोप है कि बिहार प्रभारी कृष्णा अल्लावरू, राजेश राम और शकील खान ने पैसे लेकर टिकट दिए हैं। उन्होंने अपनी शिकायत राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे तक पहुंचाने की बात कही है।
राजद में भी फूटा असंतोष, रितु जायसवाल ने बगावत की:
राजद के अंदर भी टिकट वितरण को लेकर असंतोष की लपटें तेज हो चुकी हैं। मधुबन से पूर्व प्रत्याशी मदन साह ने टिकट न मिलने पर विरोध प्रदर्शन किया, वहीं सीतामढ़ी की रितु जायसवाल ने परिहार सीट से टिकट कटने के बाद स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने की घोषणा की।
रितु जायसवाल ने कहा, “परिहार मेरी आत्मा से जुड़ा है, किसी अन्य क्षेत्र से चुनाव लड़ना मेरे सिद्धांतों के खिलाफ है।” उनका यह बयान साफ संकेत देता है कि राजद में टिकट वितरण में पारिवारिक समीकरण और रसूख की राजनीति हावी रही है।
पप्पू यादव की भूमिका और गठबंधन की असमंजसता:
पूर्णिया सांसद पप्पू यादव भी इस पूरे विवाद के केंद्र में हैं। कांग्रेस के भीतर जहां उन पर “टिकट डील” के आरोप लगे हैं, वहीं वे लालू यादव को “गठबंधन धर्म निभाने” की सलाह दे रहे हैं। उन्होंने कहा, “कांग्रेस के बिना कोई सरकार नहीं बन सकती, लालू यादव को पुरानी राजनीति छोड़नी होगी।” यह बयान महागठबंधन के भीतर गहराते अविश्वास को और स्पष्ट करता है।
गठबंधन का संकट: एकता से ज्यादा स्वार्थ की राजनीति:
पहले चरण के नामांकन की प्रक्रिया पूरी होने के बावजूद सीट शेयरिंग पर सहमति नहीं बन सकी है। कांग्रेस में आर्थिक प्रभाव तो राजद में वंशवाद और निष्ठा की राजनीति चरम पर है। इन दोनों प्रवृत्तियों ने महागठबंधन की एकजुटता पर गहरा संकट खड़ा कर दिया है।
चुनाव से पहले ही उभरा अंदरूनी युद्ध:
जहां एनडीए अपने चुनाव प्रचार में पूरी ताकत झोंक रहा है, वहीं महागठबंधन टिकटों की लड़ाई, आरोपों और आपसी अविश्वास में उलझा है। बगावत के स्वर और वायरल ऑडियो क्लिप ने विपक्ष की “एकता” की कहानी को सवालों के घेरे में ला दिया है।



