चित्रकूट जिले में सामने आया कोषागार (ट्रेजरी) घोटाला स्थानीय प्रशासन और वित्तीय निगरानी में गम्भीर कमियों का उदाहरण है। कहा जा रहा है कि सात वर्षों में लगभग 120 करोड़ रुपये की संदिग्ध निकासी हुई, जिसका खुलासा अंततः एक शिक्षक की पत्नी की सतर्कता से हुआ।
घटनाक्रम
आरोप है कि 2018 से 2025 तक ट्रेजरी में पेंशन और वेतन संबंधी फर्जी भुगतान किए गए।
कई फर्जी खातों पर लेनदेन दिखे — विशेषकर सेवानिवृत्त शिक्षकों के नामों पर।
एक शिक्षक की पत्नी ने अपने बैंक खाते में अजनबी राशि आने पर पूछताछ की; इसी से संदिग्ध लेनदेन का पता चला।
जांच के बाद कुछ खातों को सीज़ किया गया और प्रारम्भिक रूप से कुछ राशि वसूल की गयी।
जांच जारी है; संभव है कि ट्रेजरी कर्मचारी, दलाल और कुछ खाताधारक मिलीभगत में रहे हों।
कारण और विश्लेषण
यह मामला स्पष्ट करता है कि जहां प्रक्रियात्मक पारदर्शिता और ऑडिट कमजोर हों, वहां लंबी अवधि तक गड़बड़ी चल सकती है।
फर्जी खातों की पहचान और असली खातों के सत्यापन में कमी ने इस घोटाले को लंबा चलने दिया।
लोकल स्तर पर जागरूक नागरिक (जैसे इस केस में शिक्षक की पत्नी) की भूमिका निर्णयात्मक साबित हुई।
प्रभाव और सिफारिशें
दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए; साथ ही तंत्र में सुधार अनिवार्य है—ऑनलाइन ट्रांजैक्शन लॉग, द्वि-स्तरीय सत्यापन, नियमित ऑडिट।
जागरूकता बढ़ाने के लिए बैंक खाताधारकों और पेंशनभोगियों को भी सूचित किया जाना चाहिए ताकि संदिग्ध भुगतानों पर वे तुरंत सवाल उठा सकें।
प्रशासन को लोकल शिकायत तंत्र को तेज और पारदर्शी बनाना होगा।



