भोपाल में कल एक लंबे समय बाद ऐसा नज़ारा देखने को मिला, जब प्रदेश के कोने-कोने से आए हजारों शिक्षक अपनी मांगों को लेकर एक मंच पर खड़े नजर आए। करीब 11 साल बाद राजधानी में शिक्षकों का इतना बड़ा जमावड़ा हुआ, जिसने सरकार का ध्यान अपनी ओर खींच लिया।
इन शिक्षकों का कहना है कि टीईटी परीक्षा को अनिवार्य बनाए जाने का फैसला उनके भविष्य पर सीधा असर डाल रहा है। कई शिक्षकों को डर है कि नई व्यवस्था लागू होने से उनकी नौकरी खतरे में पड़ सकती है, जबकि उन्होंने वर्षों से शिक्षा व्यवस्था को संभाला है।

प्रदर्शन के दौरान शिक्षकों ने साफ शब्दों में कहा कि वे किसी भी स्थिति में टीईटी की अनिवार्यता को स्वीकार नहीं करेंगे। उनका मानना है कि जो शिक्षक पहले से कार्यरत हैं, उनके अनुभव और सेवा को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
इस मुद्दे पर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने भी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने सरकार से अपील करते हुए कहा कि शिक्षकों की मांगों को गंभीरता से सुना जाए और उनके साथ न्याय किया जाए। उन्होंने यह भी कहा कि जब मामला न्यायालय में है, तब सरकार को शिक्षकों का पक्ष मजबूती से रखना चाहिए।
कमलनाथ ने अपने बयान में यह भी जोड़ा कि भारतीय संविधान और कानून हमेशा मानवीय दृष्टिकोण को प्राथमिकता देते हैं। ऐसे में शिक्षकों की आजीविका और उनके वर्षों के योगदान को ध्यान में रखते हुए कोई व्यावहारिक और न्यायसंगत समाधान निकाला जाना चाहिए।


