रायपुर। चिंगरापगार जलप्रपात क्षेत्र जो छत्तीसगढ़ के गरियाबंद ज़िले में स्थित है यहां वन विभाग की बड़ी लापरवाही सामने आई है। “सौंदर्यीकरण” के नाम पर करीब ₹20 लाख खर्च कर दिए गए, चट्टानों पर 24 कृत्रिम जानवरों की आकृतियाँ उकेरी गईं है। यह कार्य जनता के पैसे की बर्बादी तो है ही, साथ ही भारतीय वन अधिनियम, 1927 और वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 का खुला उल्लंघन भी है।
प्रकृति से खिलवाड़
किसी भी संरक्षित वन क्षेत्र या प्राकृतिक धरोहर—जैसे झरना, नदी या चट्टान के लिए कानून स्पष्ट रूप से कहता है कि—की प्राकृतिक संरचना से छेड़छाड़ अपराध है। इन स्थानों पर कृत्रिम निर्माण या तोड़फोड़ करना पर्यावरण को स्थायी नुकसान पहुँचाता है। जलप्रपात की चट्टानों पर की गई नक्काशी से वहाँ के सूक्ष्मजीवों और वनस्पतियों के अस्तित्व पर संकट खड़ा हो गया है।

जनता के पैसे का गलत उपयोग
वन संरक्षण, वन्यजीव सुरक्षा और स्थानीय आदिवासी समुदायों के कल्याण जैसे ज़रूरी काम वन विभाग द्वारा खर्च किए गए ₹20 लाख से किए जा सकते थे । लेकिन इसके बजाय यह पैसे एक ऐसे कार्य के लिए बर्बाद किया गया जो अवैध और नुकसानदेह है।
अपराध को उपलब्धि बताई जा रही
सबसे हैरान कर देने वाली बात यह है कि जो काम पूरी तरह गैरकानूनी और अपराध है उसको उपलब्धि के रूप में प्रचारित किया जा रहा है । हकीकत तो यह है कि यह सीधा अपराध है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इस पर तुरंत कार्रवाई नहीं की गई तो भविष्य में अन्य प्राकृतिक स्थलों पर भी ऐसे अपराध और गैरकानूनी कार्य करने में नहीं कतराएंगे जो प्राकृतिक धरोहर से खिलवाड़ है।
जल्द कार्रवाई की माँग
स्थानीय नागरिकों और पर्यावरणविदों ने इस मामले की जाँच कर दोषी अधिकारियों और ठेकेदारों पर कड़ी कानूनी कार्रवाई की माँग की है। लोगों का कहना है कि यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि जनता के भरोसे और पर्यावरण दोनों के साथ विश्वासघात है।







