भारत में कोयला खनन को लेकर बहस फिर गर्म हो गई है। छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य जैसे घने और जैव विविधता वाले जंगलों में लगातार खनन परियोजनाएँ चल रही हैं, जबकि देश की वास्तविक बिजली माँग 250 GW से भी कम है।
सरकारी आँकड़ों के मुताबिक, भारत की कुल स्थापित बिजली क्षमता 450 गीगावॉट से ऊपर पहुँच चुकी है, जिसमें अकेले सौर ऊर्जा की क्षमता 85 GW से अधिक है। इसके बावजूद, सोलर पावर का पूरा उपयोग नहीं हो पा रहा है।
विशेषज्ञों की राय
- कोयला लॉबी का दबाव: ऊर्जा विश्लेषकों का कहना है कि कोयला कंपनियों और औद्योगिक हितों के दबाव में प्राकृतिक वनों को नष्ट किया जा रहा है।
- नीतिगत खामियाँ: पर्याप्त सौर क्षमता होने के बावजूद स्टोरेज टेक्नोलॉजी, ग्रिड प्रबंधन और नीति असंतुलन के कारण नवीकरणीय ऊर्जा का सही इस्तेमाल नहीं हो रहा।
- पर्यावरणीय खतरा: हसदेव अरण्य न केवल कोयले के भंडार के लिए बल्कि अपनी जैव विविधता, हाथियों के आवास और आदिवासी समुदायों की आजीविका के लिए भी अहम है।
बड़ा सवाल
जब देश की बिजली ज़रूरत मौजूदा क्षमता से कम है और सौर ऊर्जा जैसे स्वच्छ विकल्प मौजूद हैं, तो क्या वनों को काटकर कोयला खनन करना उचित है?







