रायपुर।वन संपदा और जैव विविधता से समृद्ध छत्तीसगढ़ इन दिनों वन्यजीव संरक्षण के गंभीर संकट का सामना कर रहा है। राज्य में लंबे समय से प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) यानी चीफ़ वाइल्डलाइफ़ वार्डन की कुर्सी खाली पड़ी है। हैरानी की बात यह है कि फिलहाल इस जिम्मेदारी के लिए कोई प्रभारी अधिकारी भी नियुक्त नहीं किया गया है।
कानूनी प्रक्रियाओं पर असर
वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के अनुसार शिकार रोकथाम, घायल जानवरों का रेस्क्यू, मानव-वन्यजीव संघर्ष से जुड़े त्वरित निर्णय, शोध एवं फिल्मांकन की अनुमति जैसे मामलों में निर्णय केवल चीफ़ वाइल्डलाइफ़ वार्डन ही ले सकते हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ में यह पद महीनों से खाली है, जिससे वन विभाग की कार्यप्रणाली प्रभावित हो रही है।
बाघ-हाथी जैसे वन्यजीव खतरे में
छत्तीसगढ़ के जंगलों में हाथी, बाघ, भालू और तेंदुआ जैसी संवेदनशील प्रजातियां पाई जाती हैं। हाल ही में हाथियों के हमले और बाघों की हलचल की घटनाओं ने चिंता बढ़ाई है। ऐसे में जिम्मेदार अधिकारी की अनुपस्थिति वन्यजीव प्रबंधन और त्वरित कार्रवाई को कमजोर कर रही है।
प्रशासन पर उठे सवाल
वन्यजीव विशेषज्ञ और पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि इतने महत्वपूर्ण पद को महीनों तक खाली छोड़ना वन विभाग की गंभीर लापरवाही है। सवाल यह है कि –
- आपात स्थिति में फैसले कौन लेगा?
- वन्यजीवों और ग्रामीणों की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी होगी?
- आखिर सरकार इस संवेदनशील मुद्दे पर कब तक चुप्पी साधे रहेगी?
वन्यजीव और ग्रामीण दोनों असुरक्षित
चीफ़ वाइल्डलाइफ़ वार्डन की अनुपस्थिति का सीधा असर केवल जानवरों पर ही नहीं, बल्कि जंगल से सटे इलाकों में रहने वाले ग्रामीणों की सुरक्षा पर भी पड़ रहा है। वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं में त्वरित निर्णय न मिलने से जन-धन की हानि का खतरा बढ़ गया है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि इस पद को खाली छोड़ना सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि “छत्तीसगढ़िया (अरुण पांडेय) बनाम बिहारी (प्रेम कुमार)” बहस से भी जुड़ा है। कई सामाजिक संगठन मानते हैं कि सरकार बाहरी अफसरों को प्राथमिकता देकर स्थानीय अधिकारियों और छत्तीसगढ़िया हितों की अनदेखी कर रही है। इस विवाद ने वन विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब देखना होगा कि सरकार कब तक इस अहम पद को भरती है और कब तक राज्य को उसका चीफ़ वाइल्डलाइफ़ वार्डन मिलता है।







