हाल के वर्षों में, शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की भूमिका में एक बड़ा बदलाव देखा गया है। यह अब केवल एक क्षेत्रीय सुरक्षा संगठन नहीं रहा, बल्कि एक ऐसा मंच बन गया है जो पश्चिमी देशों, विशेष रूप से अमेरिका, के प्रभुत्व वाली मौजूदा विश्व व्यवस्था को चुनौती देने की क्षमता रखता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और राष्ट्रपति शी जिनपिंग की तिकड़ी इस संगठन को नई दिशा दे रही है, जिससे बहु-ध्रुवीय (multipolar) विश्व का उदय हो रहा है।
एससीओ की बढ़ती ताकत
एससीओ दुनिया का सबसे बड़ा क्षेत्रीय संगठन है, जो भौगोलिक विस्तार और आबादी दोनों के मामले में विशाल है। इसके 10 सदस्य देशों (चीन, रूस, भारत, पाकिस्तान, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, उज्बेकिस्तान, ईरान और बेलारूस) में दुनिया की लगभग 42% आबादी रहती है और ये दुनिया की कुल अर्थव्यवस्था का लगभग 22.5% हिस्सा हैं। इसकी ताकत सिर्फ सुरक्षा सहयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि अब इसमें व्यापार, ऊर्जा, परिवहन और सांस्कृतिक आदान-प्रदान भी शामिल हो गए हैं। हाल ही में ईरान और बेलारूस को पूर्ण सदस्य के रूप में शामिल करने से संगठन का प्रभाव और बढ़ गया है।
मोदी-पुतिन-जिनपिंग की तिकड़ी
भले ही भारत, रूस और चीन के बीच अपने-अपने राष्ट्रीय हित और कुछ मतभेद हैं, लेकिन वे कई साझा लक्ष्यों पर एकजुट होते हैं:
- बहु-ध्रुवीय विश्व की वकालत: तीनों देश एक ऐसी विश्व व्यवस्था का समर्थन करते हैं जहाँ शक्ति किसी एक देश या गुट के हाथों में केंद्रित न हो। वे संयुक्त राष्ट्र और अन्य बहुपक्षीय संस्थानों को मजबूत करना चाहते हैं।
- पश्चिमी देशों के दबाव का मुकाबला: अमेरिका और उसके सहयोगियों द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों और व्यापार शुल्क का तीनों देशों ने मिलकर विरोध किया है। रूस और चीन ने आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी को मजबूत किया है, जबकि भारत ने भी अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हुए रूस से तेल आयात जारी रखा है।
एससीओ की स्थापना का एक प्रमुख उद्देश्य आतंकवाद, अलगाववाद और उग्रवाद से लड़ना था। इस मोर्चे पर तीनों देशों के हित समान हैं।
भू-राजनीतिक निहितार्थ
एससीओ के मजबूत होने से मौजूदा विश्व व्यवस्था पर कई तरह के प्रभाव पड़ सकते हैं:
- अमेरिकी प्रभुत्व में कमी: एससीओ एक ऐसा मंच प्रदान करता है जहाँ सदस्य देश बिना पश्चिमी हस्तक्षेप के महत्वपूर्ण रणनीतिक और आर्थिक फैसले ले सकते हैं। यह डॉलर-आधारित व्यापार प्रणाली को भी चुनौती दे सकता है।
- क्षेत्रीय स्थिरता: एससीओ मध्य एशिया और यूरेशिया क्षेत्र में शांति और स्थिरता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है, जिससे इन क्षेत्रों में अमेरिकी प्रभाव कम हो सकता है।
भारत के लिए अवसर
भारत के लिए एससीओ पश्चिमी देशों के साथ-साथ रूस और चीन के साथ अपने संबंधों को संतुलित करने का एक महत्वपूर्ण मंच है। यह भारत को अपनी “रणनीतिक स्वायत्तता” (strategic autonomy) बनाए रखने में मदद करता है। हालाँकि, चीन और पाकिस्तान के साथ सीमा विवाद और मतभेद संगठन के भीतर भारत की भूमिका को चुनौतीपूर्ण भी बनाते हैं।
यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि एससीओ पूरी तरह से विश्व व्यवस्था को बदल देगा, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह एक महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में उभर रहा है। यह अमेरिकी प्रभुत्व को चुनौती देने और एक बहु-ध्रुवीय, अधिक संतुलित विश्व बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। मोदी-पुतिन-जिनपिंग की तिकड़ी, अपने-अपने हितों और लक्ष्यों के साथ, इस प्रक्रिया में एक केंद्रीय भूमिका निभा रही है, जिससे दुनिया की भू-राजनीतिक तस्वीर में लगातार बदलाव आ रहा है।







