बारिश में भीगते बच्चे, जर्जर छत के नीचे पढ़ाई: 44 साल से नए भवन का इंतज़ार कर रहा हसदा का स्कूल

Madhya Bharat Desk
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कितनी सुरक्षित है बच्चों की पढ़ाई?
अभनपुर ब्लॉक के हसदा 2 गांव का शासकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय बदहाली की मिसाल बन चुका है। यहां कक्षा 6 से 12 तक के छात्र-छात्राएं खुले आसमान, कैंटीन या लैब में पढ़ने को मजबूर हैं। भवन की छत और खंभे इतने जर्जर हो चुके हैं कि कभी भी गिर सकते हैं। बारिश के दिनों में क्लास रोकनी पड़ती है, जिससे पढ़ाई पर गंभीर असर पड़ रहा है।

1981 में बना भवन अब खंडहर
1981 में बना यह स्कूल भवन अब खंडहर में बदल चुका है। 2012-13 में जनसहयोग से चार कमरे और लैब बने, लेकिन 300 से ज्यादा बच्चों के लिए ये भी पर्याप्त नहीं हैं। छात्र बताते हैं कि खुले में पढ़ाई के दौरान बारिश, धूप, वाहन शोर और जानवरों की आवाजाही से ध्यान भटकता है और नतीजतन रिजल्ट 20-30% तक गिर गए हैं।

प्रिंसिपल और सरपंच की गुहार
प्रिंसिपल रामकृष्ण निषाद ने बताया कि बच्चों की सुरक्षा के लिए उन्हें खुले में या कैंटीन-लैब में क्लास लेनी पड़ती है। 15 साल से नए भवन की मांग शासन तक भेजी जा रही है। गांव के सरपंच ने कहा कि सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने जनवरी में एक साल में नया भवन देने का वादा किया था, लेकिन अब तक कोई काम शुरू नहीं हुआ।

‘दिया तले अंधेरा’ की सच्ची तस्वीर
सरकार स्मार्ट क्लास और शिक्षा सुधार के दावे करती है, लेकिन हसदा का यह स्कूल न बिजली की सही व्यवस्था पा सका है, न सुरक्षित कक्ष। अभिभावक और गांववाले सरकार से अपील कर रहे हैं कि बच्चों की जान और भविष्य सुरक्षित करने के लिए जल्द नया भवन बनाया जाए।

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