“राम के नाम की सरकार ने राम के जंगल को अडानी पूंजीपति को बेच दिया!”

Madhya Bharat Desk
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छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में स्थित हसदेव अरण्य फिर विवादों में है। रामगढ़ की उस पवित्र पहाड़ी, जिसे भगवान श्रीराम के वनवास काल से जोड़ा जाता है, को अब कोयला खनन के लिए अडानी समूह को सौंप दिया गया है। यह वही रामगढ़ है, जिसे धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत के तौर पर देखा जाता है — लेकिन अब इसी आस्था के केंद्र को मशीनों की गर्जना के हवाले किया जा रहा है।

स्थानीय लोगों और विपक्ष का आरोप है कि सरकार ने ‘राम के नाम’ पर सत्ता तो ली, लेकिन अब ‘राम के जंगल’ को पूंजीपतियों के हाथों बेच दिया गया है। यह बयान सिर्फ एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि एक गहरी सामाजिक और सांस्कृतिक चिंता को व्यक्त करता है।

रामगढ़ की पहाड़ी के बारे में मान्यता है कि श्रीराम ने अपने वनवास के कुछ दिन यहीं बिताए थे। यह स्थान आज भी धार्मिक आस्था, लोककथाओं और आदिवासी परंपराओं का अभिन्न हिस्सा है। इसके बावजूद, इस क्षेत्र को खनन के लिए खोलना आस्था, पर्यावरण और आजीविका तीनों पर सवाल खड़े करता है।

हसदेव अरण्य क्षेत्र में अब तक 5 लाख से अधिक पेड़ों की कटाई हो चुकी है। पर्यावरण कार्यकर्ताओं और स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार यह सिर्फ शुरुआत है। जंगलों के उजड़ने से जहां सैकड़ों वन्यजीवों का घर खतरे में है, वहीं यहां के आदिवासी समुदायों की ज़िंदगी भी संकट में आ गई है।

यह संघर्ष केवल पेड़ों या कोयले का नहीं, बल्कि संस्कृति और अस्तित्व का है। स्थानीय आदिवासी समुदाय सालों से इस फैसले के विरोध में संघर्ष कर रहा है। सड़कों पर प्रदर्शन, धरना, अनशन, और कई बार पुलिसिया कार्रवाई — इन सबके बावजूद उनकी आवाज़ें मुख्यधारा मीडिया और नीति-निर्माताओं तक नहीं पहुंच पा रही हैं।

विपक्ष सवाल उठा रहा है — क्या राम के नाम की राजनीति करने वाले अब राम के जंगल को बेचकर रामायण को भी कॉरपोरेट ब्रांड में बदल रहे हैं? यह एक कटाक्ष नहीं, बल्कि हिंदुत्व और विकास की परिभाषा पर सीधा सवाल है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या आस्था अब भी पवित्र है या वह भी मुनाफे की बोली में बिक चुकी है? क्या हम विकास की अंधी दौड़ में अपनी सांस्कृतिक पहचान और पर्यावरण दोनों को खो रहे हैं?

हसदेव अरण्य और रामगढ़ केवल भूभाग नहीं — वे हमारी आत्मा का हिस्सा हैं। अब जब खनन कंपनियों के बुलडोज़र इस आत्मा को भी रौंदने की तैयारी में हैं, तब हर नागरिक को यह सोचना चाहिए कि क्या सच में ‘विकास’ की कीमत पर हमारी ‘विरासत’ बिकनी चाहिए?

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