बेगूसराय — क्रांति की कविताओं के जनक रामधारी सिंह “दिनकर” की भूमि एक बार फिर बदलाव की चेतना से गूंज उठी। इस बार कलम नहीं, जनसैलाब गवाह बना बिहार की नई राजनीति के आगाज़ का।
बखरी, बेगूसराय का एक छोटा सा इलाका, उस वक्त ऐतिहासिक क्षण का साक्षी बना जब प्रशांत किशोर की जनसभा में अपार भीड़ उमड़ पड़ी। लोगों का उत्साह इतना अधिक था कि मैदान छोटा पड़ गया, लेकिन जनसैलाब का उत्साह कम नहीं हुआ।
‘जन सुराज’ के मंच से प्रशांत किशोर ने जिस तरह जनता से सीधा संवाद किया, वह पारंपरिक राजनीति से बिल्कुल अलग था। न नारों का शोर, न वादों की बौछार — सिर्फ जनभागीदारी की अपील और विकास का खाका।
भीड़ में मौजूद हजारों लोगों ने हाथों में झंडे, नारों और फूल-मालाओं से प्रशांत किशोर का स्वागत किया। इस दृश्य ने साफ कर दिया कि बिहार की जनता अब कुछ नया चाहती है — एक ऐसा विकल्प जो व्यवस्था को जड़ों से बदले।
बखरी की यह जनसभा सिर्फ एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि बिहार के बदलते मिजाज की झलक थी।



