बिहार में 36 लाख मतदाता सूची से गायब! एसआईआर सर्वे में खुलासा, विपक्ष ने उठाए चुनाव आयोग पर सवाल

Madhya Bharat Desk
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पटना।बिहार में चुनाव आयोग द्वारा कराए जा रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) अभियान में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। पहले चरण के आंकड़ों के मुताबिक, लगभग 36 लाख मतदाता या तो अपने पते से पलायन कर चुके हैं या फिर संपर्क में नहीं हैं। इस खुलासे ने राज्य की मतदाता सूची की विश्वसनीयता को लेकर बहस छेड़ दी है।

आयोग के अनुसार, करीब 7 लाख मतदाताओं के नाम दो या उससे अधिक स्थानों पर दर्ज पाए गए हैं, जबकि 22 लाख से अधिक नाम ऐसे हैं जिनकी मृत्यु हो चुकी है। पुनरीक्षण के बाद ऐसे सभी नामों को मतदाता सूची से हटाया जाएगा। इस प्रक्रिया में बिहार के 7.9 करोड़ मतदाताओं में से 91.69% यानी 7.24 करोड़ लोगों के फॉर्म एकत्र किए गए हैं। आयोग का दावा है कि वर्तमान मतदाता सूची के 99.8% हिस्से को कवर कर लिया गया है।

चुनाव आयोग की सफाई और कानूनी आधार

चुनाव आयोग ने 24 जून 2025 को एक अधिसूचना जारी कर विशेष पुनरीक्षण की घोषणा की थी। यह पुनरीक्षण 25 जून से 26 जुलाई 2025 तक चल रहा है। आयोग ने स्पष्ट किया है कि यह प्रक्रिया जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 और रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्टर्स रूल्स 1960 के तहत की जा रही है ताकि सूची को शुद्ध, सटीक और निष्पक्ष बनाया जा सके।

आयोग का कहना है कि सूची से नाम हटाने का मतलब नागरिकता रद्द करना नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य सिर्फ यह सुनिश्चित करना है कि फर्जी या दोहराए गए नामों को हटाया जाए। आयोग ने यह भी बताया कि जरूरत पड़ने पर वह नागरिकता से संबंधित दस्तावेज मांग सकता है, ताकि मताधिकार सुनिश्चित किया जा सके।

राजनीतिक विवाद और विपक्ष का आरोप

इस पुनरीक्षण अभियान को लेकर विपक्षी दलों ने सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि एसआईआर के नाम पर नागरिकता जांच की जा रही है और इससे गरीबों, अल्पसंख्यकों और प्रवासी मजदूरों के मतदान अधिकारों पर खतरा है। विपक्ष का आरोप है कि यह एक छिपा हुआ तरीका हो सकता है जिससे चुनिंदा वर्गों को चुनाव प्रक्रिया से बाहर किया जा सके।

हालांकि, आयोग ने इस आशंका को खारिज करते हुए कहा है कि प्रक्रिया पूरी तरह संवैधानिक और पारदर्शी है। साथ ही यह भी स्पष्ट किया है कि कोई भी पात्र नागरिक उचित दस्तावेजों के साथ पुनः मतदाता सूची में शामिल हो सकता है।

बिहार में इस समय चल रहा यह गहन पुनरीक्षण अभियान न केवल राज्य बल्कि देशभर की मतदाता सूचियों की पारदर्शिता और शुद्धता को लेकर एक नया विमर्श शुरू कर चुका है। जहां एक ओर आयोग इसे लोकतंत्र की मजबूती से जोड़ रहा है, वहीं दूसरी ओर राजनीतिक दल इसे संभावित भेदभाव और धांधली से जोड़कर देख रहे हैं।

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