आगामी बिहार चुनावों को लेकर कांग्रेस के भीतर इन दिनों गहमागहमी तेज है। एक ओर जहाँ राहुल गांधी जीत की उम्मीद लगाए बैठे हैं, वहीं दूसरी ओर पार्टी में टिकट पाने की चाह रखने वालों की लंबी कतार है। इस बीच, कांग्रेस की रणनीति में जातियों, खासकर ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) पर अत्यधिक ध्यान दिया जा रहा है, जिससे कई सवाल खड़े हो रहे हैं कि आखिर पार्टी में चल क्या रहा है और इसका परिणाम क्या होगा।
टिकट की आस और जातिगत फोकस
सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस ओबीसी वर्ग की लगभग 85 अधिकृत लिस्टेड जातियों और उनके उप-वर्गों को मिलाकर करीब 200-250 जातियों पर फोकस कर रही है। पार्टी का मानना है कि जनसंख्या के आधार पर किसी एक प्रमुख जाति को टिकट देकर एक बड़ा वोट बैंक हासिल किया जा सकता है। राहुल गांधी की इस कवायद से सभी जातियों में टिकट की उम्मीद जाग गई है, जिससे पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं में उत्साह का माहौल है।
ध्रुवीकरण का डर और संभावित नुकसान
हालांकि, इस रणनीति के अपने जोखिम हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि जाति के नाम पर ध्रुवीकरण करने से न केवल संबंधित जाति एकजुट होती है, बल्कि इसका सीधा असर दूसरी जातियों पर भी पड़ता है, जिससे उनमें भी ध्रुवीकरण की प्रवृत्ति बढ़ती है। इससे समाज में जातिगत टकराव बढ़ने की आशंका है। ऐसे में, यह फार्मूला फायदेमंद होने के बजाय नुकसानदेह साबित हो सकता है, क्योंकि यह सामाजिक सद्भाव को बिगाड़ सकता है।
आंतरिक असहमति का खतरा
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि टिकट केवल किसी एक जाति को मिलता है, तो क्या उस क्षेत्र की अन्य उप-जातियां और वर्ग उस एक नाम पर सहमत हो पाएंगे? पार्टी के भीतर भी यह चिंता है कि यदि सभी को टिकट नहीं मिलता, तो आंतरिक असंतोष बढ़ सकता है, जिससे चुनावी समीकरण बिगड़ सकते हैं। राहुल गांधी की इस एक्सरसाइज से सभी जातियों में टिकट की आस तो जग जाएगी, पर यह देखना होगा कि क्या सब किसी एक नाम पर सहमत हो पाते हैं या नहीं।
कुल मिलाकर, कांग्रेस की यह जाति-केंद्रित रणनीति जहाँ एक ओर जीत की संभावना तलाश रही है, वहीं दूसरी ओर इसके संभावित नकारात्मक परिणामों को लेकर भी असमंजस बना हुआ है। आने वाला समय ही बताएगा कि कांग्रेस का यह दांव कितना सफल होता है और क्या यह पार्टी को जीत दिला पाएगा या नई चुनौतियों को जन्म देगा।



