छत्तीसगढ़ में चैतन्य बघेल की गिरफ्तारी के बाद राजनीतिक माहौल तेजी से गर्म हो गया है। कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए इसे “राजनीतिक प्रतिशोध” की संज्ञा दी है। प्रियंका गांधी वाड्रा ने आरोप लगाया कि अडानी समूह द्वारा छत्तीसगढ़ के जंगलों की अंधाधुंध कटाई और आदिवासी समुदायों के शोषण को उजागर करने से पहले ही, पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के बेटे को निशाना बनाकर गिरफ्तार किया गया।

लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि जब प्रदेश में भूपेश बघेल की ही सरकार थी, तब अडानी समूह को परियोजनाओं के लिए संरक्षण उन्हीं की सरकार ने दिया था। उस समय तत्कालीन उपमुख्यमंत्री टी.एस. सिंहदेव ने इन गतिविधियों का विरोध किया था, जिससे सरकार के भीतर ही मतभेद उभरकर सामने आए थे।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि चाहे कांग्रेस हो या बीजेपी, दोनों ही पूंजीपतियों के खिलाफ कठोर रुख अपनाने से बचते हैं, लेकिन जनता के सामने एक-दूसरे को कठघरे में खड़ा कर सियासी लाभ लेने का खेल जारी रहता है। सवाल यह भी है कि भूपेश बघेल की सरकार रहते हुए अडानी मुद्दे पर मौन क्यों था, और अब विपक्ष में आकर अचानक तीखा विरोध क्यों?
छत्तीसगढ़ जैसे आदिवासी बहुल राज्य में बार-बार विकास के नाम पर जंगलों की कटाई और मूल निवासियों के अधिकारों का हनन चिंता का विषय है। ऐसे में सिर्फ बयानबाज़ी नहीं, बल्कि नीति और नीयत में ईमानदारी की आवश्यकता है।
इधर, बीजेपी नेता राजेश मूणत ने चैतन्य बघेल की गिरफ्तारी को कानून की प्रक्रिया बताते हुए कहा कि अगर किसी के खिलाफ ठोस प्रमाण हैं, तो जांच एजेंसियों को कार्रवाई करने से कोई नहीं रोक सकता। उन्होंने कहा, “जैसा करोगे वैसा भरोगे — यही गीता का सिद्धांत है। दूध का दूध, पानी का पानी हो जाएगा।”

अब देखना होगा कि इस पूरे घटनाक्रम में जांच एजेंसियों की रिपोर्ट और जनता का जनादेश किसके पक्ष में जाता है।







