भारत में शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा जैसी बुनियादी ज़रूरतें अब आम आदमी की पहुंच से बाहर होती जा रही हैं। प्राइवेट अस्पताल और स्कूल मुनाफा कमाने के अड्डे बन गए हैं, जहां मरीजों और बच्चों को एक “ATM मशीन” की तरह देखा जाता है।
इलाज अब इंसानियत का नहीं, एक कारोबार का हिस्सा बन गया है। गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार कर्ज लेकर इलाज करवा रहे हैं, तो वहीं शिक्षा एक कोचिंग माफिया के इर्द-गिर्द घूम रही है। सरकारी स्कूलों की हालत जर्जर है, जहां न शिक्षक हैं, न संसाधन।
वहीं दूसरी ओर नेता और विधायक जनता के टैक्स के पैसों पर विदेशों में मुफ्त इलाज करवाते हैं, लेकिन जनता को बदहाल सरकारी अस्पतालों और जर्जर स्कूलों की मजबूरी सौंप दी जाती है।
सबसे बड़ा सवाल यह नहीं कि सिस्टम क्यों टूटा हुआ है, बल्कि यह है कि इसे सुधारने की ईमानदारी आखिर क्यों गायब है?
क्या शिक्षा और स्वास्थ्य भी अब सिर्फ कारोबार का हिस्सा बनकर रह जाएंगे?







