रायपुर:महानदी जल बंटवारे को लेकर चार दशक से जारी विवाद अब पटाक्षेप की ओर बढ़ता दिख रहा है। छत्तीसगढ़ और ओडिशा सरकारों ने इस पुराने विवाद को सौहार्दपूर्ण बातचीत के ज़रिए सुलझाने की पहल तेज़ कर दी है। आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक, ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने हाल ही में एक उच्च स्तरीय बैठक में स्पष्ट संकेत दिया कि उनकी सरकार छत्तीसगढ़ के साथ मिलकर आपसी सहमति से समाधान चाहती है।
उन्होंने केंद्र सरकार और केंद्रीय जल आयोग (CWC) से मध्यस्थता और सहयोग की मांग की है, ताकि दोनों राज्यों के बीच संवाद को स्थायित्व मिल सके। उल्लेखनीय है कि दोनों राज्यों में फिलहाल भारतीय जनता पार्टी की सरकारें हैं, जिसे एक ‘डबल इंजन’ शासन मॉडल के रूप में देखा जा रहा है। ऐसे में इस मामले का हल निकलने की उम्मीद और प्रबल हो गई है।
छत्तीसगढ़ सरकार के अधिकारियों ने ओडिशा सरकार की इस सकारात्मक पहल का स्वागत करते हुए कहा कि राज्य भी संवाद और आपसी सहमति की दिशा में कदम बढ़ाने को तैयार है।
क्या है विवाद की जड़?
महानदी नदी के जल वितरण को लेकर यह विवाद 1983 से चला आ रहा है। ओडिशा का आरोप है कि छत्तीसगढ़ अपनी सीमा में बांध और बैराज बनाकर हीराकुंड डैम में जल प्रवाह को बाधित कर रहा है, जिससे ओडिशा में जल संकट गहराता जा रहा है। दूसरी ओर, छत्तीसगढ़ का कहना है कि वह सिर्फ अपने हिस्से के पानी का इस्तेमाल कर रहा है और किसी भी तरह का गैरकानूनी निर्माण कार्य नहीं हुआ है।
महानदी से जुड़े अहम तथ्य:
- महानदी की कुल लंबाई 885 किलोमीटर है, जिसमें से करीब 285 किलोमीटर छत्तीसगढ़ में बहती है।
- इसका उद्गम सिहावा पर्वत (धमतरी) से होता है।
- इसकी प्रमुख सहायक नदियाँ: पैरी, सोंढूर, हसदेव, शिवनाथ, अरपा, जोंक और तेल।
- छत्तीसगढ़ में प्रमुख जल संरचनाएं: रुद्री बैराज, गंगरेल डैम।
- ओडिशा में मुख्य केंद्र: हीराकुंड बांध (संबलपुर)।
छत्तीसगढ़ का यह भी कहना है कि हीराकुंड बांध, जिसे केंद्र सरकार ने बनाया और बाद में ओडिशा को सौंपा था, अब औद्योगिक जल आपूर्ति के लिए अधिक उपयोग में लिया जा रहा है, जिससे गर्मियों में जल संकट और गहराता है।
सुप्रीम कोर्ट और प्राधिकरण की भूमिका:
यह मामला वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। केंद्र सरकार द्वारा गठित महानदी जल विवाद ट्रिब्यूनल ने भी कई बैठकों के माध्यम से समाधान खोजने का प्रयास किया है।
अब जब दोनों राज्यों के मुख्यमंत्री संवाद की राह पर हैं, तो यह उम्मीद की जा रही है कि वर्ष 2025 में यह ऐतिहासिक विवाद एक शांतिपूर्ण समझौते के साथ समाप्त होगा। इससे महानदी बेसिन क्षेत्र के सतत विकास और आपसी सहयोग की नई इबारत लिखी जा सकेगी।



