लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मण वोट बैंक को अपने पक्ष में करने की कोशिशें तेज़ हो गई हैं। अब समाजवादी पार्टी (सपा) ने भी इस दिशा में गंभीर प्रयास शुरू कर दिए हैं। आगामी 7 मई 2025 को पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ‘ब्राह्मण सम्मेलन’ आयोजित कर पार्टी की रणनीति का इशारा देंगे।
सपा का लक्ष्य 2027 के विधानसभा चुनाव में पीडीए (पिछड़े, दलित, मुस्लिम) के साथ ब्राह्मणों को जोड़कर एक नया सामाजिक समीकरण बनाना है। माना जा रहा है कि जातीय संतुलन के ज़रिए पार्टी भाजपा के प्रभाव को चुनौती देना चाहती है।
इस कड़ी में सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने हरदोई के पूर्व सांसद और प्रभावशाली ब्राह्मण नेता हरिशंकर तिवारी के बेटे कुशल तिवारी को पार्टी में शामिल कर सियासी संदेश देने की कोशिश की है। इसके साथ ही पंडितों और ब्राह्मण संगठनों के नेताओं से भी संपर्क किया जा रहा है।
तिवारी परिवार की सपा में एंट्री:
सपा को आशा है कि तिवारी परिवार की एंट्री से पूर्वांचल में उसकी पकड़ मजबूत होगी, जहां भाजपा फिलहाल मज़बूत स्थिति में है।
नया समीकरण या सियासी जोखिम?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सपा को ब्राह्मणों के साथ पीडीए वर्ग को संतुलित करना चुनौतीपूर्ण रहेगा। यदि ब्राह्मणों को ज़्यादा तवज्जो दी गई तो परंपरागत पिछड़ा, दलित और मुस्लिम मतदाता असहज हो सकता है।
‘ब्राह्मण बनाम पीडीए’ की चुनौती:
अखिलेश यादव ने कहा कि सपा सभी वर्गों का सम्मान करती है और ‘एक समाज, एक सम्मान’ की नीति के तहत सभी समुदायों को साथ लेकर चलेगी। उन्होंने संकेत दिए कि भाजपा की ‘ब्राह्मण वर्चस्व’ राजनीति के बरक्स सपा ‘समावेशी मॉडल’ पर आगे बढ़ेगी।







