नई दिल्ली। कर्नाटक की कांग्रेस सरकार जल्द ही ‘रोहित वेमुला सामाजिक न्याय विधेयक’ (Rohith Vemula Social Justice Bill) को विधानसभा में पेश करने जा रही है। यह विधेयक राहुल गांधी की पहल पर तैयार किया गया है और इसका उद्देश्य विश्वविद्यालयों तथा उच्च शिक्षण संस्थानों में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और अल्पसंख्यक समुदायों के छात्रों और कर्मचारियों के खिलाफ हो रहे जातिगत भेदभाव को रोकना है।
क्या है विधेयक में?
इस प्रस्तावित कानून के तहत यदि किसी भी विश्वविद्यालय या शिक्षण संस्थान में छात्रों, शिक्षकों या कर्मचारियों के साथ जाति, धर्म या सामाजिक पहचान के आधार पर भेदभाव किया जाता है, तो दोषी व्यक्ति को:
- अधिकतम 3 साल तक की सजा,
- और/या ₹10 लाख तक का जुर्माना भुगतना पड़ सकता है।
विधेयक में यह भी प्रावधान है कि प्रत्येक शिक्षण संस्थान में भेदभाव निगरानी समिति गठित की जाएगी, जो इन मामलों की जांच और समाधान करेगी।

राहुल गांधी और सोनिया गांधी की रणनीति का विस्तार
विशेषज्ञों का मानना है कि यह विधेयक 2011 में सोनिया गांधी द्वारा सुझाए गए ‘सांप्रदायिक हिंसा रोकथाम विधेयक’ की भावना को आगे बढ़ाता है, जिसका उद्देश्य भी समाज के वंचित तबकों को न्याय दिलाना था।
राहुल गांधी लंबे समय से रोहित वेमुला जैसे मामलों को उठाते रहे हैं और अब उनके दबाव में पार्टी सामाजिक न्याय पर आक्रामक रुख अपनाती दिख रही है।
आदिवासियों और ओबीसी पर भी ध्यान
कांग्रेस की रणनीति सिर्फ रोहित वेमुला विधेयक तक सीमित नहीं है। सूत्रों के मुताबिक राहुल गांधी ने हाल ही में आदिवासी नेताओं से मुलाक़ात कर अलग ‘आदिवासी धर्म कोड’ की मांग पर समर्थन जताया है। यह कदम आदिवासी समाज की धार्मिक पहचान को संवैधानिक दर्जा दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
वहीं, कांग्रेस के भीतर OBC काउंसिल के गठन और उसमें नेताओं को बड़ी भूमिका देने के ज़रिए ओबीसी समुदाय को भी राजनीतिक रूप से सशक्त करने की रणनीति अपनाई जा रही है। पार्टी के कई नेता दावा कर चुके हैं कि देश की 90% से ज़्यादा जनसंख्या ओबीसी, एससी, एसटी और अल्पसंख्यकों की है, और कांग्रेस अब इन्हीं तबकों पर फोकस कर रही है।
आखिर बाकी नेताओं के लिए जगह कितनी?
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि कांग्रेस का यह सामाजिक न्याय अभियान आगामी चुनावों की रणनीति का हिस्सा है, जिससे पार्टी अपने पारंपरिक वोट बैंक को पुनः सशक्त करना चाहती है। हालांकि पार्टी के अंदर ही अब यह सवाल उठने लगा है कि इस नए संतुलन के बीच बाकी वर्गों और नेताओं की स्थिति क्या होगी?
‘रोहित वेमुला विधेयक’ न केवल एक क़ानूनी दस्तावेज़ है, बल्कि कांग्रेस की सामाजिक न्याय को लेकर बदली हुई दिशा और स्पष्ट प्राथमिकताओं का संकेत भी है। राहुल गांधी इसे एक आंदोलन की शक्ल देना चाहते हैं, जिससे शिक्षा के क्षेत्र में वंचित तबकों के साथ हो रहे अन्याय को खत्म किया जा सके।



