छत्तीसगढ़ के बेमेतरा जिले के पथर्रा गांव में इथेनॉल प्लांट से उठती बदबू ने ग्रामीणों का जीना मुश्किल कर दिया है। कई महीनों से लगातार धरना जारी है। प्रशासन तक गुहार लगाई गई, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। इसके बावजूद ग्रामीणों का हौसला टूटा नहीं है।

धरनास्थल पर हर दिन महिलाएं जुटती हैं। वे सरकार और फैक्ट्री प्रबंधन को कोसती हैं, खुले शब्दों में विरोध जताती हैं और श्राप तक देती हैं। उनका कहना है कि “हम क्या कर सकते हैं? यही तो कर सकते हैं।” यह विरोध अब सिर्फ पर्यावरण या स्वास्थ्य का मामला नहीं रहा — यह एक अस्मिता और अस्तित्व की लड़ाई बन चुका है।
यह संघर्ष बताता है कि जब संस्थाएं चुप हो जाती हैं, तब जनता अपने दम पर बोलती है — चाहे उसकी आवाज़ धीमी हो, लेकिन जिद के साथ।



