नक्सलियों और सरकार के बीच शांति वार्ता और संघर्ष विराम (सीजफायर) को लेकर हाल के दिनों में घटनाक्रम तेज़ हो गया है। छत्तीसगढ़, तेलंगाना और अन्य नक्सल प्रभावित राज्यों में सुरक्षाबलों की लगातार कार्रवाई के बाद नक्सली अब बैकफुट पर नजर आ रहे हैं और उन्होंने सरकार से बार-बार शांति वार्ता की पहल करने की मांग की है।
छत्तीसगढ़ में सुरक्षाबलों की लगातार कार्रवाई और बड़े नक्सली नेताओं के मारे जाने के बाद नक्सलियों की सेंट्रल कमेटी ने एक पत्र जारी किया। इसमें कहा गया कि अगर सरकार एंटी नक्सल ऑपरेशन बंद करने का ऐलान करती है, तो नक्सली बातचीत के लिए तैयार हैं। उनका कहना है कि बीते 15 महीनों में उनके 400 से ज्यादा साथी मारे गए हैं, जिससे संगठन को बड़ा नुकसान हुआ है। यही कारण है कि वे अब संघर्ष विराम और शांति वार्ता की मांग कर रहे हैं।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बस्तर दौरे से ठीक पहले नक्सलियों ने तत्काल युद्धविराम और सशर्त शांति वार्ता की मांग की। नक्सलियों के प्रवक्ता अभय ने केंद्र सरकार से एंटी नक्सल ऑपरेशन को रोकने, सुरक्षाबलों की वापसी और माओवादी विरोधी अभियानों को रोकने की अपील की है। तेलंगाना में भी नक्सलियों ने एकतरफा एक महीने का युद्धविराम घोषित किया था, लेकिन केंद्र सरकार की ओर से कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली।
तेलंगाना प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बी. महेश कुमार गौड़ ने भी केंद्र सरकार से माओवादियों के साथ शांति वार्ता शुरू करने की मांग की है। उनका कहना है कि माओवादी देश के अपने नागरिक हैं, जो गरीबों और सामाजिक अन्याय के खिलाफ लड़ रहे हैं। उन्होंने सरकार से अपील की कि माओवादियों के खिलाफ चल रहे ऑपरेशन को तत्काल रोककर उनके साथ शांति वार्ता शुरू की जाए और सीजफायर की घोषणा की जाए। कांग्रेस नेता ने यह भी कहा कि जब कांग्रेस सत्ता में थी, तब शांति वार्ता के प्रयास सफल रहे थे और कई नक्सली मुख्यधारा में लौट आए थे, लेकिन कांग्रेस माओवादियों की हिंसक राजनीति के खिलाफ है।
नक्सलियों ने अपने पत्र में केंद्र सरकार पर यह भी आरोप लगाया है कि सरकार पाकिस्तान से तो शांति वार्ता करने को तैयार है, लेकिन देश के आदिवासियों और नक्सलियों से बात करने के लिए तैयार नहीं है। उनका कहना है कि वे हमेशा वार्ता के लिए तैयार रहे हैं, लेकिन सरकार अनुकूल माहौल नहीं बना रही है। नक्सलियों ने मांग की है कि सुरक्षा बलों के ऑपरेशन पर रोक लगाई जाए, नए कैंपों की स्थापना बंद हो और वार्ता के लिए माहौल तैयार किया जाए।
कुल मिलाकर, नक्सलियों के लगातार पत्र और शांति वार्ता की मांगें इस बात का संकेत हैं कि उन पर सुरक्षा बलों का दबाव काफी बढ़ गया है। वहीं, सरकार का रुख सख्त है और वह 2026 तक नक्सलवाद खत्म करने के लक्ष्य पर कायम है। दूसरी ओर, कांग्रेस और कुछ क्षेत्रीय दल बातचीत के जरिए समाधान निकालने की वकालत कर रहे हैं। इस घटनाक्रम से नक्सल प्रभावित इलाकों में राजनीतिक और सामाजिक माहौल में हलचल है।



