पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव को कम करने के उद्देश्य से अमेरिका और ईरान के बीच हुई उच्चस्तरीय शांति वार्ता बिना किसी ठोस नतीजे के समाप्त हो गई। इस बैठक में दोनों पक्ष अपने-अपने रुख पर अड़े रहे, जिसके चलते समझौते की उम्मीदें टूट गईं और क्षेत्र में एक बार फिर संघर्ष के बादल मंडराने लगे हैं।
21 घंटे चली बातचीत, लेकिन नतीजा शून्य
करीब 21 घंटे चली इस कूटनीतिक वार्ता में दोनों देशों के प्रतिनिधियों ने अपने-अपने पक्ष रखे, लेकिन कोई भी पक्ष झुकने को तैयार नहीं हुआ। बातचीत खत्म होने के बाद अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा कि किसी तरह का समझौता नहीं हो सका और यह स्थिति अमेरिका से ज्यादा ईरान के लिए नुकसानदेह है।
ईरान का आरोप: अमेरिका ने रखी अव्यावहारिक शर्तें
ईरानी पक्ष से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, अमेरिका ने ऐसे प्रस्ताव रखे जिन्हें स्वीकार करना संभव नहीं था। ईरान का कहना है कि अमेरिका ने उन मांगों को आगे रखा जो संघर्ष के दौरान भी हासिल नहीं हो पाई थीं। इनमें प्रमुख रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण और ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर कड़े प्रतिबंध शामिल हैं।
ईरान ने स्पष्ट किया कि वह परमाणु हथियार नहीं बनाएगा, लेकिन यूरेनियम संवर्धन पूरी तरह रोकने की शर्त स्वीकार नहीं करेगा।
कहां अटका समझौता?
बातचीत की सबसे बड़ी अड़चन होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण और परमाणु कार्यक्रम को लेकर रही। अमेरिका चाहता है कि होर्मुज जलडमरूमध्य पूरी तरह से अंतरराष्ट्रीय जहाजों के लिए खुला रहे, जबकि ईरान इस क्षेत्र में अपने रणनीतिक प्रभाव को बनाए रखना चाहता है।
इसके अलावा, अमेरिका ने ईरान की परमाणु सुविधाओं को बंद करने और यूरेनियम भंडार को अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी को सौंपने की मांग की, जिसे ईरान ने खारिज कर दिया।
पाकिस्तान की अपील: युद्धविराम जारी रहे
बातचीत की मेजबानी कर रहे पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने दोनों पक्षों से अपील की कि युद्धविराम को बनाए रखा जाए और संवाद के रास्ते को बंद न किया जाए। उन्होंने कहा कि क्षेत्रीय स्थिरता के लिए शांति बेहद जरूरी है।
आगे क्या?
फिलहाल ईरान ने अमेरिका के साथ अगली वार्ता की किसी योजना से इनकार किया है और कहा है कि अब गेंद अमेरिका के पाले में है। दूसरी ओर, अमेरिका की ओर से भी आगे की बातचीत को लेकर कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिला है।
अगर दोनों पक्ष अपने रुख पर कायम रहते हैं, तो आने वाले दिनों में पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ सकता है, जिसका असर क्षेत्रीय सुरक्षा और वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर भी पड़ सकता है।






