पश्चिम बंगाल के आगामी चुनाव अब महज वोटों की होड़ नहीं, बल्कि लोकतंत्र की खूनी परीक्षा बन चुके हैं। सवाल वही पुरानाक्या भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में आज भी हिंसा-मुक्त चुनाव एक सपना मात्र है?
अगर हां, तो आखिर गुनाह किसका: सियासत की गंदगी या प्रशासन की लाचारी?
केंद्र ने 2400 CAPF जवानों की फौज उतार दी है—एक साफ इशारा कि चुनाव आयोग किसी भी हाल में निष्पक्षता की ढाल थामे रखेगा।
लेकिन यह सख्ती लोकतंत्र की ताकत है या मजबूरी का करुण चित्रण? क्या बिना बंदूक के भारत के वोट सुरक्षित नहीं?
चुनाव से ठीक पहले प्रशासन का ऐसा झाड़ू—मुख्य सचिव, डीजीपी, कोलकाता पुलिस कमिश्नर सब बेदखल! चुनाव आयोग ने साफ संदेश दिया: पक्षपात या लापरवाही बर्दाश्त नहीं।
बिहार याद है? वहां इसी फॉर्मूले ने हिंसा को ठेंगा दिखाया—ट्रांसफरों की बौछार, CAPF की दीवारें, हर बूथ पर कड़ी नजर। नतीजा? शांति का मॉडल।
लेकिन बंगाल का इतिहास खून से सना है। तीन दशक से चुनाव यहां युद्धक्षेत्र। जनता का यकीन टूट चुका—‘बंगाल में शांत चुनाव? नामुमकिन!’ यह चुनौती न सिर्फ राज्य की, बल्कि चुनाव आयोग की साख पर सीधी चोट है।

राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी मनोज कुमार का ऐलान जोरदार: “CAPF का राज, लोकल पुलिस बाहर!” मतदान केंद्र CAPF के कब्जे में, कर्मी सुरक्षित, छेड़छाड़ का नामोनिशान नहीं। लेकिन क्या यह कवच वोटर के दिल तक पहुंचेगा?
अब निर्णायक सवाल: क्या इस बार लोकतंत्र की जंग जीतेगा? क्या लाखों मतदाता डर-दबाव से आजाद होकर वोट डाल पाएंगे? जवाब मतदान दिवस पर जनता के चेहरे पर—चुनौती स्वीकारो, बंगाल!



