महासागर बन रहे ‘हीट बैंक’: पृथ्वी की 91% अतिरिक्त गर्मी समेट रहे समुद्र

Madhya Bharat Desk
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पृथ्वी का तापमान सिर्फ बढ़ नहीं रहा, बल्कि उसका पूरा ऊर्जा संतुलन बिगड़ चुका है और इस संकट का सबसे बड़ा बोझ महासागर उठा रहे हैं।

हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, बीते कई दशकों में पृथ्वी पर जमा हुई अतिरिक्त गर्मी का करीब 91 प्रतिशत हिस्सा समुद्रों ने अपने अंदर समेट लिया है। यही वजह है कि वैज्ञानिक अब केवल सतही तापमान नहीं, बल्कि “अर्थ्स एनर्जी इम्बैलेंस (EEI)” को जलवायु परिवर्तन का सबसे सटीक पैमाना मान रहे हैं।

क्या है एनर्जी इम्बैलेंस?

सरल भाषा में समझें तो यह वह अंतर है, जो सूरज से पृथ्वी तक आने वाली ऊर्जा और वापस अंतरिक्ष में लौटने वाली ऊर्जा के बीच होता है। जब यह संतुलन बिगड़ता है और ज्यादा ऊर्जा पृथ्वी पर रुकने लगती है, तो ग्रह लगातार गर्म होता जाता है।

रिपोर्ट के अनुसार, 1960 के बाद पहली बार 2025 में यह असंतुलन अपने सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया है। यह संकेत देता है कि जलवायु परिवर्तन अब केवल तापमान बढ़ने की कहानी नहीं, बल्कि पूरी पृथ्वी के ऊर्जा तंत्र के गहरे संकट की चेतावनी है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि वायुमंडल इस अतिरिक्त गर्मी का सिर्फ एक छोटा सा हिस्सा ही संभाल पाता है लगभग 1 प्रतिशत। ऐसे में अगर हम केवल तापमान के आंकड़ों को देखकर स्थिति को समझने की कोशिश करें, तो यह अधूरी तस्वीर होगी।

 ग्रीनहाउस गैसों ने तोड़े रिकॉर्ड

जलवायु संकट की जड़ में ग्रीनहाउस गैसों का तेजी से बढ़ता स्तर है। साल 2024 में कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) की मात्रा 423.9 ppm तक पहुंच गई—जो पिछले 20 लाख वर्षों में सबसे अधिक मानी जा रही है।

सिर्फ CO₂ ही नहीं, बल्कि मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड जैसी गैसें भी रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुकी हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह स्थिति प्राकृतिक बदलावों से कहीं आगे निकल चुकी है और सीधे तौर पर मानव गतिविधियों का परिणाम है।

 खाद्य सुरक्षा और समाज पर असर

इस बदलते जलवायु का असर अब साफ तौर पर जमीन पर दिखने लगा है। खेती प्रभावित हो रही है, जिससे खाद्य संकट का खतरा बढ़ रहा है।

वहीं, बाढ़, सूखा और अन्य चरम मौसम की घटनाएं लोगों को अपने घर छोड़ने पर मजबूर कर रही हैं। इससे बड़े पैमाने पर पलायन हो रहा है, खासकर उन इलाकों में जो पहले से ही आर्थिक या सामाजिक अस्थिरता झेल रहे हैं।

 संयुक्त राष्ट्र की चेतावनी

संयुक्त राष्ट्र के महासचिव Antonio Guterres ने इस स्थिति को ‘वैश्विक आपातकाल’ बताया है। उनका कहना है कि पृथ्वी को उसकी सीमाओं से आगे धकेला जा रहा है और लगातार बढ़ते तापमान के रिकॉर्ड इस बात का साफ संकेत हैं कि अब कार्रवाई टालना संभव नहीं।

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