देश में विदेशी फंडिंग पाने वाले गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) पर अब सरकार और कड़ा नियंत्रण लगाने की तैयारी में है। केंद्र सरकार जल्द ही संसद के इसी सत्र में Foreign Contribution Regulation Act (FCRA) में संशोधन से जुड़ा नया विधेयक पेश कर सकती है। इसका मकसद विदेशी चंदे के इस्तेमाल में पारदर्शिता लाना और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े संभावित खतरों को रोकना है।
नई व्यवस्था के तहत हर उस एनजीओ को, जो विदेश से फंड लेता है, एक नामित प्राधिकरण (Designated Authority) नियुक्त करना अनिवार्य होगा। यह प्राधिकरण इस बात की निगरानी करेगा कि विदेशी पैसा उसी उद्देश्य पर खर्च हो रहा है या नहीं, जिसके लिए उसे दिया गया था।
सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अगर कोई संस्था नियमों का उल्लंघन करती है या उसके खिलाफ गड़बड़ी साबित होती है, तो सरकार को उसकी संपत्ति जब्त कर उसे बेचने का अधिकार मिल जाएगा। इस संपत्ति से मिलने वाली राशि को भारत के संचित कोष (Consolidated Fund of India) में जमा किया जा सकता है।
सरकारी सूत्रों के मुताबिक, देश में लगभग 16,000 एफसीआरए-पंजीकृत संस्थाएं हर साल करीब 22,000 करोड़ रुपये का विदेशी चंदा प्राप्त करती हैं। मौजूदा कानून में इस फंड के उपयोग और प्रबंधन को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देशों की कमी महसूस की जा रही थी, जिसे अब दूर करने की कोशिश की जा रही है।
प्रस्तावित संशोधन में यह भी कहा गया है कि अगर किसी एनजीओ का एफसीआरए लाइसेंस रद्द हो जाता है, निलंबित होता है या उसका नवीनीकरण नहीं होता, तो उसकी संपत्ति सरकार अपने नियंत्रण में ले सकती है। इसके लिए एक विशेष प्राधिकरण बनाया जाएगा, जो संपत्तियों के प्रबंधन और निस्तारण का काम करेगा।
इसके अलावा, एनजीओ अपनी संपत्ति सरकार की अनुमति के बिना नहीं बेच पाएंगे। वहीं, यदि तय समयसीमा के भीतर विदेशी फंड का उपयोग निर्धारित उद्देश्य के लिए नहीं किया गया, तो उस पर भी कार्रवाई हो सकती है।
एक और अहम बदलाव यह है कि एनजीओ के प्रमुख पदों पर बैठे लोग जैसे निदेशक, ट्रस्टी या प्रबंधन समिति के सदस्य संस्था की गतिविधियों के लिए व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार माने जाएंगे।
हालांकि, सरकार ने एक राहत भी दी है। विदेशी फंडिंग के नियमों के उल्लंघन पर मिलने वाली सजा को कुछ हद तक कम करने का प्रस्ताव है। जहां पहले अधिकतम 5 साल की सजा का प्रावधान था, उसे घटाकर 4 साल करने की बात कही गई है।
साथ ही, किसी भी एनजीओ के खिलाफ विदेशी फंड से जुड़ी आपराधिक जांच शुरू करने से पहले राज्य सरकारों और जांच एजेंसियों को केंद्र से अनुमति लेना अनिवार्य होगा।
कुल मिलाकर, यह संशोधन विदेशी फंडिंग को ज्यादा पारदर्शी और जवाबदेह बनाने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।







