नई दिल्ली। वैश्विक आर्थिक हालात और मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव का असर अब भारत की अर्थव्यवस्था पर भी दिखने लगा है। सोमवार को भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अपने इतिहास के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। कारोबार की शुरुआत में ही रुपया फिसलकर 92.33 प्रति डॉलर तक पहुंच गया, जो अब तक का ऑल-टाइम लो है।
विदेशी मुद्रा बाजार में सोमवार सुबह रुपया 92.20 प्रति डॉलर के स्तर पर खुला, जबकि पिछले कारोबारी सत्र में यह 91.74 प्रति डॉलर पर बंद हुआ था। शुरुआती कारोबार के दौरान गिरावट और तेज हो गई और रुपया पिछले सप्ताह के निचले स्तर को पार करते हुए रिकॉर्ड गिरावट दर्ज कर गया।
महंगे कच्चे तेल का असर
विशेषज्ञों का कहना है कि रुपये की इस गिरावट के पीछे मुख्य वजह कच्चे तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी है। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के चलते वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों में उछाल आया है।
ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत लगभग 26% बढ़कर 117 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई, जिससे उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं पर दबाव बढ़ गया है।
RBI ने किया हस्तक्षेप
मार्केट के जानकारों के अनुसार, रुपये की तेज गिरावट को रोकने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप किया। बताया जा रहा है कि बाजार खुलने से पहले केंद्रीय बैंक ने डॉलर बेचकर रुपये को थोड़ी राहत देने की कोशिश की, जिससे कुछ समय के लिए रुपया 92.30 से 92.20 के आसपास लौट आया।
एक बैंक के करेंसी ट्रेडर के मुताबिक, “मौजूदा हालात में रुपये पर दबाव बना रहेगा। ऐसे में बाजार की अस्थिरता को नियंत्रित करने के लिए केंद्रीय बैंक को हस्तक्षेप करना पड़ सकता है।”
भारत पर क्यों पड़ता है ज्यादा असर
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चे तेल का आयातक देश है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत बढ़ने का सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
तेल का व्यापार अमेरिकी डॉलर में होता है, इसलिए जब रुपया कमजोर होता है तो भारत को उतनी ही मात्रा में तेल खरीदने के लिए ज्यादा रुपये खर्च करने पड़ते हैं। इससे देश का आयात बिल बढ़ जाता है और महंगाई पर भी दबाव बढ़ सकता है।







