एक समय अपनी सादगी, लोकसंस्कृति और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए पहचाना जाने वाला छत्तीसगढ़ आज एक ऐसे संकट से जूझ रहा है, जो चुपचाप उसकी सामाजिक जड़ों को खोखला कर रहा है। शहरों से लेकर गांवों तक नशे का फैलता दायरा अब अफवाह नहीं, बल्कि रोज़ दिखने वाली सच्चाई बन चुका है।
यह वही धरती है जिसे , , और जैसे महान व्यक्तित्वों की कर्मभूमि कहा जाता है। आज उसी प्रदेश में युवा पीढ़ी नशे के शिकंजे में फंसती दिखाई दे रही है।
सार्वजनिक स्थानों पर खुली लत
चौराहों, नदी किनारों, पुल-पुलिया के नीचे और यहां तक कि सामुदायिक भवनों के आसपास खुलेआम नशा करते लोगों की तस्वीरें आम होती जा रही हैं। जहां कभी गांवों में महुआ की खुशबू और मिट्टी की सोंधी महक महसूस होती थी, वहां अब गांजा और अन्य नशीले पदार्थों की गंध चिंता बढ़ा रही है।
पहले जहां एक छोटी पुड़िया मिलने पर हड़कंप मच जाता था, अब बड़ी मात्रा में गांजा, अवैध शराब और सिंथेटिक ड्रग्स की खेप पकड़े जाने की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। पान ठेलों और छोटी दुकानों से नशीली गोलियां और कफ सिरप तक की उपलब्धता ने हालात और गंभीर बना दिए हैं।
युवा पीढ़ी पर सीधा असर
सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि स्कूल और कॉलेजों के आसपास भी नशे की आसान उपलब्धता के आरोप लग रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि नशा केवल शरीर को नुकसान नहीं पहुंचाता, बल्कि व्यक्ति की सोच, निर्णय क्षमता और व्यवहार को भी प्रभावित करता है।
सड़क हादसों, अपराधों और घरेलू हिंसा के मामलों में कई बार नशे की भूमिका सामने आती है। सवाल यह है कि क्या हम अपनी सबसे बड़ी पूंजी — अपने युवाओं — को बचा पा रहे हैं?
राज्य गठन के बाद भी अनसुलझा सवाल
राज्य बनने के बाद उम्मीद थी कि विकास की धारा जनकल्याण की दिशा में बहेगी। लेकिन आज हालात यह संकेत दे रहे हैं कि कहीं न कहीं निगरानी और सामाजिक जवाबदेही में कमी रह गई है।
जब नशा आसानी से उपलब्ध हो जाए, नियंत्रण कमजोर पड़ जाए और समाज चुप हो जाए — तब आपराधिक तंत्र अपने आप मजबूत हो जाता है।
सरकार और गृह मंत्री से जवाब की मांग
अब निगाहें सरकार और गृह विभाग पर टिकी हैं। जनता सवाल कर रही है:
- क्या अवैध शराब और ड्रग्स के नेटवर्क पर सख्त कार्रवाई होगी?
- क्या स्कूल-कॉलेज क्षेत्रों को विशेष निगरानी में लिया जाएगा?
- क्या पंचायत स्तर पर जनजागरूकता अभियान और कानूनी कार्रवाई साथ-साथ चलाई जाएगी?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते निर्णायक कदम नहीं उठाए गए तो इसके परिणाम बेहद गंभीर हो सकते हैं — परिवारों का विघटन, बढ़ते अपराध और कमजोर होती सामाजिक संरचना।
अब मानव संपदा बचाने का समय
छत्तीसगढ़ खनिज संपदा के लिए जाना जाता है, लेकिन आज उससे भी अधिक जरूरी है मानव संपदा की रक्षा।
नशा केवल एक व्यक्ति की सेहत नहीं छीनता — यह पूरे समाज की चेतना और भविष्य को प्रभावित करता है।
यदि सरकार, प्रशासन और समाज मिलकर ठोस रणनीति नहीं बनाते, तो आने वाली पीढ़ियों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।







