छत्तीसगढ़ सरकार धान खरीदी को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि बताती नहीं थकती, लेकिन बालोद ज़िले की हकीकत इस दावे की पोल खोल रही है। यहाँ धान संग्रहण केंद्रों में कार्यरत ठेकाश्रमिकों को तीन महीने से पारिश्रमिक नहीं मिला, और मजबूर होकर वे हड़ताल पर बैठ गए। नतीजा—तौल, लोडिंग-अनलोडिंग और भंडारण जैसे सभी जरूरी काम पूरी तरह ठप।
सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि इस गंभीर मामले पर जवाबदेह अधिकारियों से संपर्क किया गया तो फोन उठाना तक ज़रूरी नहीं समझा गया। यह लापरवाही नहीं, बल्कि साफ संदेश है कि इस सिस्टम में मेहनतकश श्रमिकों की कोई हैसियत नहीं। महीनों तक बिना वेतन काम कराना क्या शोषण नहीं? या ठेकाश्रमिक होना ही सबसे बड़ा अपराध है?
श्रमिकों का आरोप है कि बार-बार शिकायत और गुहार के बावजूद न भुगतान हुआ, न कोई ठोस जवाब मिला। हालत यह है कि आला अधिकारी जनप्रतिनिधियों की बात तक सुनने को तैयार नहीं हैं। जब चुने हुए जनप्रतिनिधियों की अनदेखी हो रही है, तो आम श्रमिक की सुनवाई की उम्मीद ही बेकार है।
इस हड़ताल का खामियाजा किसानों को भी भुगतना पड़ रहा है, लेकिन प्रशासन की चुप्पी बताती है कि न श्रमिक मायने रखते हैं, न किसान। सवाल सीधा है—क्या धान खरीदी सिर्फ़ कागज़ों और भाषणों तक सीमित रह गई है?







